गंगरेल डैम की डुबान के बीच बसे सटियारा गांव में अंग्रेजों के जमाने से आजादी के दौर तक के अखबार आज भी श्रद्धा से सुरक्षित
प्रधान संपादक दीपक यादव की कलम से , बालोद/धमतरी। क्या आपने कभी ऐसा गांव देखा है, जहां अखबार सिर्फ पढ़े नहीं जाते, बल्कि पूजा भी की जाती है? जहां पुराने अखबारों के पन्नों को महज कागज नहीं, बल्कि देश की आजादी की लड़ाई की जीवित धरोहर माना जाता है? जहां अंग्रेजी हुकूमत के दौर में प्रकाशित समाचार पत्रों से लेकर स्वतंत्रता आंदोलन के समय की खबरों तक को आज भी श्रद्धा और सम्मान के साथ सहेजकर रखा गया है? अगर नहीं, तो बालोद जिले के अंतिम छोर पर गंगरेल डैम की डुबान के बीच बसे धमतरी जिले के सटियारा (छठियारा) गांव की यह कहानी आपको जरूर हैरान करेगी। यहां अखबारों की पूजा होती है। जी हां, वही अखबार जिन्होंने कभी अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ जनमत तैयार किया, देशवासियों में राष्ट्रीय चेतना जगाई और स्वतंत्रता आंदोलन की खबरों को गांव-गांव तक पहुंचाया। सटियारा में ऐसे पुराने अखबारों को आज भी बेहद श्रद्धा के साथ देखा जाता है। यहां अखबार के पन्ने केवल खबरों का संग्रह नहीं, बल्कि उस दौर के संघर्ष, आंदोलन और देशभक्ति की निशानी माने जाते हैं। गंगरेल डैम की अथाह जलराशि, पहाड़ों और जंगलों के बीच बसा यह छोटा-सा वनवासी गांव अपने भीतर इतिहास का एक ऐसा अध्याय समेटे हुए है, जिसकी जानकारी शायद बहुत कम लोगों को है। यहां स्थित भारत माता मंदिर में राष्ट्रभक्ति केवल एक भावना नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही आस्था और परंपरा है।
जब अखबार बन गए आजादी के दस्तावेज
आज हम मोबाइल फोन पर कुछ सेकंड में देश-दुनिया की खबर पढ़ लेते हैं। लेकिन एक समय था जब अखबार ही जनता तक देश और दुनिया की खबर पहुंचाने का सबसे बड़ा माध्यम हुआ करते थे। स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में अखबारों ने अंग्रेजी हुकूमत की नीतियों के खिलाफ आवाज बुलंद करने और आम जनता में राष्ट्रीय चेतना जगाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसीलिए सटियारा गांव में पुराने अखबारों को लेकर एक अलग तरह की श्रद्धा देखने को मिलती है। अंग्रेजी शासन काल और आजादी के दौर में प्रकाशित अखबारों की प्रतियों को यहां इतिहास की धरोहर के रूप में संभालकर रखने की परंपरा रही है। इन पुराने पन्नों में स्वतंत्रता आंदोलन, महात्मा गांधी के आंदोलनों और कंडेल नहर सत्याग्रह जैसे महत्वपूर्ण घटनाक्रमों की खबरों की स्मृतियां जुड़ी हुई हैं। इन अखबारों को देखकर ऐसा लगता है मानो इतिहास के पन्ने हमारे सामने जीवित हो उठे हों। उन पीले पड़ चुके कागजों में दर्ज शब्द आज भी उस दौर की कहानी कहते हैं, जब देश गुलामी की बेड़ियों से आजाद होने के लिए संघर्ष कर रहा था।
अखबारों के प्रति ऐसी आस्था कि होती है पूजा!
सटियारा की सबसे बड़ी खासियत यही है कि यहां अखबारों को केवल सूचना का माध्यम नहीं माना जाता। अखबारों को उस संघर्ष का प्रतीक माना जाता है, जिसने देश को आजादी की राह दिखाई। यही कारण है कि पुराने अखबारों को सम्मान दिया जाता है और भारत माता के मंदिर से जुड़ी इस परंपरा में उन्हें विशेष स्थान प्राप्त है। यह परंपरा पत्रकारिता के इतिहास के लिहाज से भी बेहद महत्वपूर्ण है। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान जब अंग्रेजी शासन के खिलाफ लिखना आसान नहीं था, तब पत्रकारों और समाचार पत्रों ने जोखिम उठाकर जनता तक सच्चाई पहुंचाने का काम किया। कई समाचार पत्रों ने राष्ट्रीय आंदोलन को आवाज दी और लोगों में स्वतंत्रता की भावना को मजबूत किया। आज जब सटियारा में इन पुराने अखबारों के प्रति श्रद्धा दिखाई जाती है, तो यह केवल अखबार का पूजन नहीं, बल्कि उन पत्रकारों, लेखकों और स्वतंत्रता सेनानियों के संघर्ष को नमन भी है, जिन्होंने अपनी कलम को आजादी की लड़ाई का हथियार बनाया।
भारत माता यहां देवी हैं, अखबार उनकी स्मृतियों के साक्षी
सटियारा में भारत माता को देवी के रूप में पूजने की परंपरा भी इस गांव को देशभर से अलग पहचान देती है। चैत्र और शारदीय नवरात्र में यहां भारत माता के नाम से मनोकामना ज्योत प्रज्वलित की जाती हैं। हर वर्ष 100 से अधिक ज्योतें जलने की बात कही जाती है। वनवासी समाज के लिए भारत माता केवल एक प्रतीक नहीं, बल्कि जीवंत आस्था हैं। यहां राष्ट्र और प्रकृति को एक-दूसरे से जुड़ा हुआ माना जाता है। उनका विश्वास है कि देश सुरक्षित रहेगा तो जंगल, जल, जमीन और जीवन भी सुरक्षित रहेंगे। इसी भारत माता मंदिर परिसर में अखबारों का सुरक्षित रहना और उन्हें सम्मान मिलना इस पूरे स्थल को और भी विशिष्ट बना देता है। एक ओर भारत माता की आराधना, दूसरी ओर महात्मा गांधी की प्रतिमा और तीसरी ओर स्वतंत्रता आंदोलन की यादों को संजोए पुराने अखबार—तीनों मिलकर सटियारा को राष्ट्रभक्ति की एक अनोखी पहचान देते हैं।
1920 के कंडेल नहर सत्याग्रह की स्मृति भी जुड़ी
मंदिर परिसर में स्थापित महात्मा गांधी की एकाश्म पत्थर से बनी प्रतिमा भी इस स्थान के ऐतिहासिक महत्व को बढ़ाती है। स्थानीय मान्यता के अनुसार, वर्ष 1920 में कंडेल नहर सत्याग्रह के दौरान महात्मा गांधी के धमतरी आगमन से प्रेरित होकर आसपास के ग्रामीणों ने गांधीजी की प्रतिमा स्थापित कर उस दौर की राष्ट्रीय चेतना को जीवित रखने का प्रयास किया था। यानी सटियारा में आज भी केवल भारत माता की पूजा नहीं होती, बल्कि गांधीजी की स्मृतियां और स्वतंत्रता आंदोलन की पत्रकारिता भी एक साथ जीवित हैं।
हर शुभ काम से पहले भारत माता के दरबार में हाजिरी
गांव में आज भी किसी शुभ कार्य की शुरुआत भारत माता के मंदिर में अर्जी लगाने के बाद करने की परंपरा बताई जाती है। शादी-विवाह, मुंडन, सामाजिक आयोजन या किसी नए कार्य से पहले लोग यहां पहुंचकर भारत माता का आशीर्वाद लेते हैं। चुनाव के समय प्रत्याशियों द्वारा भी यहां पहुंचकर जीत की कामना करने की परंपरा बताई जाती है। इस तरह यह मंदिर गांव के लिए केवल धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और लोकतांत्रिक आस्था का केंद्र भी बन गया है।
गंगरेल की डुबान में छिपा राष्ट्रभक्ति का अनोखा पर्यटन स्थल
गंगरेल डैम के प्राकृतिक सौंदर्य के बीच स्थित सटियारा का भारत माता मंदिर इतिहास और राष्ट्रभक्ति के साथ पर्यटन की दृष्टि से भी बेहद महत्वपूर्ण हो सकता है। यहां एक ओर विशाल जलराशि और प्राकृतिक सुंदरता है, तो दूसरी ओर स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ी स्मृतियां, गांधीजी की प्रतिमा और पुराने अखबारों की धरोहर। यदि इन ऐतिहासिक अखबारों और दस्तावेजों को सुरक्षित रखने के लिए एक व्यवस्थित ‘स्वतंत्रता संग्राम एवं पत्रकारिता संग्रहालय’ विकसित किया जाए, तो यह स्थान छत्तीसगढ़ में अपनी तरह का अनूठा पर्यटन केंद्र बन सकता है।
अखबारों को बचाना यानी इतिहास को बचाना
आज डिजिटल दौर में पुराने अखबार तेजी से नष्ट हो रहे हैं। कागज समय के साथ खराब होता है और यदि इन ऐतिहासिक दस्तावेजों का संरक्षण नहीं किया गया तो आने वाली पीढ़ियां इस अनमोल विरासत से वंचित हो सकती हैं। इसलिए सटियारा में सुरक्षित पुराने अखबारों का वैज्ञानिक तरीके से संरक्षण और डिजिटलीकरण किया जाना जरूरी है। क्योंकि यहां रखे अखबार सिर्फ पुराने कागज नहीं हैं। वे उस समय की आवाज हैं, जब भारत गुलाम था। वे उन पत्रकारों की कलम की गवाही हैं, जिन्होंने आजादी की लड़ाई में अपनी भूमिका निभाई। वे उन लोगों की स्मृति हैं, जिन्होंने देश को स्वतंत्र कराने के लिए संघर्ष किया। गंगरेल डैम की डुबान के बीच सटियारा की धरती पर आज भी जब भारत माता के नाम की ज्योत जलती है और पुराने अखबार श्रद्धा से देखे जाते हैं, तो ऐसा लगता है मानो इतिहास खुद कह रहा हो— “आजादी को केवल याद मत करो, उसे समझो… उसके संघर्ष को जानो…और उन पन्नों को संभालकर रखो, जिन्होंने कभी पूरे देश को जगाने का काम किया था।” सटियारा की कहानी इसलिए खास है, क्योंकि यहां अखबार पढ़े ही नहीं जाते—यहां अखबारों में दर्ज इतिहास को पूजा जाता है।
