कापसी में अनोखी पहल, पूर्वजों की परंपरा आज भी जीवित

Darshan Balod
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भोजली पर्व पर गांव में दिखी आस्था, एकता और भाईचारे की मिसाल

डौण्डी लोहारा। ग्राम कापसी में पूर्वजों से चली आ रही सदियों पुरानी परंपरा आज भी पूरी श्रद्धा और उत्साह के साथ निभाई जा रही है। यहां भोजली पर्व केवल धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि गांव की एकता, भाईचारे और सामाजिक सौहार्द का प्रतीक बन चुका है।



ग्रामीणों के अनुसार श्रावण मास के नवमी उपवास के दिन ग्राम के जगदीश रात्रे के घर से गेहूं के दाने बांटकर भोजली बोने की परंपरा शुरू होती है। गांव के लोग अपने-अपने घरों में टोकरी में भोजली बोते हैं और कई दिनों तक श्रद्धापूर्वक उसकी सेवा करते हैं।

बाजे-गाजे के साथ निकली भोजली यात्रा



रक्षाबंधन के दिन गांव का माहौल पूरी तरह उत्सवमय हो जाता है। इस अवसर पर ग्रामीण बाजे-गाजे और डांग-डोरी के साथ सामूहिक रूप से भोजली लेकर गांव के तालाब में विसर्जन के लिए पहुंचते हैं। इस दौरान महिला, पुरुष और बच्चे उत्साहपूर्वक शामिल होते हैं।

भोजली विसर्जन के बाद ग्रामीण एक-दूसरे को भोजली देकर भोजली पर्व की बधाई देते हैं और परिवार एवं गांव में सुख-समृद्धि, खुशहाली तथा आपसी प्रेम की कामना करते हैं।

पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा



ग्रामीणों का कहना है कि भोजली की यह परंपरा उनके पूर्वजों के समय से चली आ रही है। बदलते समय और आधुनिकता के बावजूद गांव के लोगों ने इस परंपरा को आज भी जीवित रखा है। भोजली पर्व के माध्यम से नई पीढ़ी को भी अपनी लोक संस्कृति और परंपराओं से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है।



ग्रामीणों के मुताबिक भोजली पर्व आपसी भाईचारे, एकता और सामाजिक सद्भाव का संदेश देता है। यही वजह है कि हर वर्ष पूरा गांव मिल-जुलकर इस पर्व को उत्साहपूर्वक मनाता है।

रिपोर्टर – नेमन साहू, रेंगाडबरी


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