बालोद की धरती के उस कर्मयोगी की कहानी, जिन्होंने स्वतंत्रता संग्राम से लेकर शिक्षा, मंदिर निर्माण और खेल मैदान के लिए भी दिया अपना अमूल्य योगदान
बालोद। भारत की आजादी का इतिहास केवल बड़े नेताओं और प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानियों के संघर्षों से नहीं लिखा गया, बल्कि देश के कोने-कोने में ऐसे अनगिनत राष्ट्रभक्तों ने भी अपना जीवन देश की स्वतंत्रता के लिए समर्पित किया, जिनके योगदान की कहानी आज भी स्थानीय इतिहास के पन्नों में सुरक्षित है। ऐसे ही राष्ट्रभक्त, समाजसेवी और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे स्व. दाऊ सरयू प्रसाद अग्रवाल, जिन्होंने छात्र जीवन से ही स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भागीदारी निभाई और देश की आजादी के लिए जेल की यातनाएं भी सहीं। स्वतंत्रता के बाद भी उनका जीवन समाजसेवा और जनहित के कार्यों के लिए समर्पित रहा।
छात्र जीवन से ही राष्ट्रसेवा का संकल्प
स्व. दाऊ सरयू प्रसाद अग्रवाल का जन्म 1 जनवरी 1910 को दुर्ग (छत्तीसगढ़) में हुआ था। उनके पिता स्व. श्री बिहारीलाल अग्रवाल और माता स्व. श्रीमती दयावती अग्रवाल थीं। प्रारंभ से ही वे शिक्षा के प्रति गंभीर और सामाजिक सरोकारों से जुड़े हुए थे। उन्होंने गवर्नमेंट हाई स्कूल रायपुर से मैट्रिक की शिक्षा प्राप्त की। इसके बाद रॉबर्टसन कॉलेज, जबलपुर से बी.एससी. तथा इलाहाबाद विश्वविद्यालय से एलएलबी की शिक्षा पूरी की।
रॉबर्टसन कॉलेज जबलपुर में अध्ययन के दौरान उन्हें सर्वोत्तम कॉलेज कंडक्ट के लिए पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। उस दौर में यह एक प्रतिष्ठित सम्मान माना जाता था, जो उनके अनुशासन, व्यक्तित्व और उत्कृष्ट आचरण का परिचायक था।लेकिन उनका जीवन केवल शिक्षा और व्यक्तिगत उन्नति तक सीमित नहीं रहा। छात्र जीवन से ही देश की गुलामी उन्हें बेचैन करती थी और वे स्वतंत्रता संग्राम के आंदोलनों में सक्रिय रूप से भाग लेने लगे।
आजादी की लड़ाई में सक्रिय भूमिका, जेल में भी नहीं झुके
स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन के दौरान सक्रिय भागीदारी के कारण उन्हें अंग्रेजी शासन की कार्रवाई का सामना करना पड़ा और जेल जाना पड़ा। भारतीय दंड विधान अधिनियम की धारा 26(1) डी.आई.आर. के अंतर्गत उन्हें रायपुर केंद्रीय जेल में 3 अक्टूबर 1942 से 4 जून 1943 तक डिटेन्यू के रूप में रखा गया। इसके बाद 4 जून 1943 को उन्हें नागपुर जेल स्थानांतरित किया गया। जेल में रहते हुए भी उनके भीतर देशभक्ति और स्वाभिमान की भावना अडिग रही। जेल प्रशासन द्वारा पहनने के लिए दिए गए मिल के कपड़े को उन्होंने स्वीकार करने से इनकार कर दिया और खादी के कपड़े की मांग की। अपने सिद्धांतों पर कायम रहने के कारण उन्हें करीब एक महीने तक केवल कंबल ओढ़कर रहना पड़ा। यह प्रसंग उनके दृढ़ राष्ट्रभाव, स्वदेशी के प्रति आस्था और स्वतंत्रता आंदोलन की विचारधारा के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को दर्शाता है।आजादी के बाद स्वतंत्रता संग्राम में उनके सक्रिय योगदान के सम्मान में उन्हें ताम्रपत्र प्रदान कर सम्मानित किया गया। यह सम्मान उनके संघर्ष और राष्ट्र के प्रति समर्पण की सरकारी मान्यता का प्रतीक रहा।
देशसेवा की भावना जेल की दीवारों से बाहर भी जारी रही
स्वतंत्रता संग्राम के दौरान संघर्ष करने वाले सरयू प्रसाद अग्रवाल का सेवाभाव आजादी के बाद भी कम नहीं हुआ। एलएलबी के छात्र रहते हुए वे बिहार में आए भूकंप के दौरान राहत कार्यों में शामिल होने के लिए पहुंच गए थे। इससे उनके व्यक्तित्व में छिपी मानवीय संवेदना और सेवा भावना का परिचय मिलता है।बाद में बालोद में वकालत करते हुए उन्होंने जमींदारी उन्मूलन आंदोलन में भी सक्रिय भागीदारी निभाई। उनका मानना था कि स्वतंत्र भारत में आम जनता को सामाजिक और आर्थिक रूप से मजबूत बनाना भी उतना ही जरूरी है, जितना देश को अंग्रेजी शासन से मुक्त कराना था।
गांव-गांव घूमकर शिक्षा के लिए जुटाया सहयोग
स्व. दाऊ सरयू प्रसाद अग्रवाल का योगदान केवल स्वतंत्रता संग्राम तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने बालोद में शिक्षा के विकास के लिए भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। गांव-गांव घूमकर ‘छेरा-छेरा पुन्नी’ के अवसर पर भिक्षा और सहयोग राशि एकत्रित कर बालोद में हाई स्कूल भवन निर्माण में योगदान दिया। उनका यह प्रयास बताता है कि वे शिक्षा को समाज के विकास का सबसे महत्वपूर्ण आधार मानते थे। उन्होंने बालोद के प्रसिद्ध महामाया मंदिर के निर्माण में भी सक्रिय भूमिका निभाई। समाज और जनहित से जुड़े इन कार्यों में उनकी भागीदारी ने उन्हें बालोद की सामाजिक स्मृतियों में एक विशिष्ट स्थान दिलाया।
सरयू प्रसाद स्टेडियम के पीछे भी है त्याग और समाजसेवा की कहानी
बालोद शहर के खेल और सामाजिक जीवन से जुड़ा सरयू प्रसाद स्टेडियम भी उनके परिवार द्वारा किए गए महत्वपूर्ण योगदान की स्मृति को संजोए हुए है।उनकी स्मृति में उनके परिवार द्वारा 19 जुलाई 1985 को गंजपारा, बालोद में स्टेडियम निर्माण के लिए करीब 5.5 एकड़ भूमि का भूमिदान किया गया। आज यही स्थान ‘सरयू प्रसाद स्टेडियम’ के नाम से जाना जाता है। यह भूमिदान केवल जमीन का दान नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए खेल, स्वास्थ्य और सामाजिक विकास का एक स्थायी उपहार है। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के रूप में देश के लिए संघर्ष करने वाले सरयू प्रसाद अग्रवाल की स्मृति आज भी इस स्टेडियम के माध्यम से बालोद की नई पीढ़ी से जुड़ी हुई है।
परिवार भी शिक्षा और सेवा की परंपरा को आगे बढ़ाता रहा
स्व. दाऊ सरयू प्रसाद अग्रवाल का विवाह स्व. श्रीमती चंद्रकांता बाई अग्रवाल से हुआ था। उनके परिवार में भी शिक्षा और सेवा की परंपरा आगे बढ़ी। उनके दो पुत्र डॉ. सत्यप्रकाश अग्रवाल और डॉ. धरम प्रकाश अग्रवाल तथा पुत्री डॉ. आशा रमेश गुप्ता हैं। उनका निधन 9 जून 1971 को हुआ, लेकिन देश की आजादी के लिए उनका संघर्ष, समाजसेवा के प्रति उनकी प्रतिबद्धता और बालोद के विकास में उनका योगदान आज भी स्मरणीय है।
आजादी के अमृत काल में ऐसे नायकों को याद करना जरूरी
स्वतंत्रता दिवस केवल तिरंगा फहराने और राष्ट्रगान गाने का अवसर नहीं, बल्कि उन अनगिनत स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को याद करने का दिन भी है, जिन्होंने देश की आजादी के लिए अपना वर्तमान कुर्बान कर आने वाली पीढ़ियों का भविष्य सुरक्षित किया। स्व. दाऊ सरयू प्रसाद अग्रवाल की जीवन यात्रा हमें बताती है कि सच्ची देशभक्ति केवल स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने तक सीमित नहीं होती। देश के लिए संघर्ष करने के बाद समाज, शिक्षा, धर्म और जनहित के कार्यों में अपना योगदान देना भी राष्ट्रसेवा का ही एक रूप है। रायपुर की जेल से लेकर नागपुर जेल तक का संघर्ष, खादी के लिए अडिग रहना, बिहार के भूकंप पीड़ितों की सेवा, जमींदारी उन्मूलन आंदोलन में भागीदारी, बालोद में शिक्षा के लिए सहयोग जुटाना, महामाया मंदिर के निर्माण में योगदान और अंततः स्टेडियम के लिए भूमि दान—सरयू प्रसाद अग्रवाल का जीवन राष्ट्रभक्ति और समाजसेवा की ऐसी विरासत है, जिसे बालोद की नई पीढ़ी के सामने लाना और सहेजना आवश्यक है। आजादी के इस विशेष अवसर पर ऐसे अल्पज्ञात स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को स्मरण करना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि है।
