‘गांधी गोरकापार’ की कहानी : अंग्रेजों की नौकरी छोड़ स्वतंत्रता संग्राम में कूदे वली मुहम्मद, ‘बापू के सपने’ से जुड़ी रिहाई की कहानी ने बदल दिया गांव का नाम

Darshan Balod
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आज भी वंशजों के पास सुरक्षित है 15 अगस्त 1947 को मिला ताम्रपत्र, लेकिन छह दशक बाद भी स्वतंत्रता सेनानी की स्मृति को स्थायी पहचान मिलने का इंतजार

बालोद/गुंडरदेही। भारत की आजादी का इतिहास केवल दिल्ली, मुंबई, कोलकाता या बड़े शहरों में लड़ी गई लड़ाइयों का इतिहास नहीं है। देश के गांवों और कस्बों की मिट्टी में भी स्वतंत्रता आंदोलन की ऐसी अनगिनत कहानियां दफन हैं, जिन्हें सामने लाना आज भी बाकी है। बालोद जिले के गुंडरदेही क्षेत्र के गोरकापार गांव की कहानी भी ऐसी ही है, जहां एक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी की देशभक्ति और महात्मा गांधी के प्रति उनकी आस्था ने गांव की पहचान ही बदल दी। आज इस गांव को ‘गांधी गोरकापार’ के नाम से जाना जाता है और इस नाम के पीछे छिपी कहानी करीब एक सदी पुरानी है। यह कहानी है स्वतंत्रता संग्राम सेनानी वली मुहम्मद की, जो कभी अंग्रेजी शासन में अमीन पटवारी के पद पर कार्यरत थे, लेकिन देश की गुलामी और स्वतंत्रता आंदोलन की पुकार ने उन्हें ऐसा प्रभावित किया कि उन्होंने अंग्रेजों की नौकरी छोड़ दी और आजादी की लड़ाई में कूद पड़े। इसके बाद उन्होंने न केवल स्वयं स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई, बल्कि डौंडी लोहारा क्षेत्र में लोगों को संगठित कर आंदोलन को मजबूत करने में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनकी जिंदगी से जुड़ी सबसे रोचक घटना उनकी जेल यात्रा और रिहाई से जुड़ी है। ‘बापू का सपना’ उनकी रिहाई की वजह बना और इस घटना के बाद ग्रामीणों ने अपने गांव के नाम के आगे ‘गांधी’ जोड़ दिया। आज भी ‘गांधी गोरकापार’ नाम इस ऐतिहासिक घटना की स्मृति को जीवित रखे हुए है।

अंग्रेजों के मुलाजिम से बन गए गांधी के सिपाही

दस्तावेजों और स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े प्रकाशित साहित्य के अनुसार, वर्ष 1920-21 के आसपास वली मुहम्मद गुंडरदेही क्षेत्र के गोरकापार में अमीन पटवारी के रूप में पदस्थ थे। इसी दौरान एक ऐसी घटना हुई, जिसने उनके जीवन की दिशा बदल दी। बताया जाता है कि एक आदिवासी की भैंस खो गई थी। वह अपनी भैंस की तलाश कर रहा था। इसी दौरान एक बूढ़े व्यक्ति ने उसे भैंस के बारे में जानकारी दी। आदिवासी उस बुजुर्ग को धन्यवाद देने के लिए खोजने लगा, तभी उसकी मुलाकात अमीन पटवारी वली मुहम्मद से हुई। संयोग से वली मुहम्मद की जेब में महात्मा गांधी की तस्वीर थी। जब आदिवासी की नजर उस तस्वीर पर पड़ी तो उसने उस तस्वीर में दिख रहे व्यक्ति को उसी बुजुर्ग के रूप में पहचान लिया, जिसने उसे भैंस के बारे में बताया था। इस घटना ने वली मुहम्मद को गहरे तक प्रभावित किया। उन्होंने महात्मा गांधी को संत-महात्मा के रूप में देखा और गांधीजी के विचारों से प्रेरित होकर अंग्रेजी शासन की नौकरी छोड़ स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल होने का निर्णय लिया। इसके बाद उनका जीवन पूरी तरह देश की आजादी के संघर्ष को समर्पित हो गया।

बापू का सपना’ और जन्माष्टमी के दिन हुई रिहाई

वली मुहम्मद की पहली जेल यात्रा और उनकी रिहाई से जुड़ी कहानी भी बेहद रोचक और स्थानीय इतिहास में विशेष स्थान रखती है। असहयोग आंदोलन के दौरान उन्हें नागपुर जेल में बंद किया गया था, जहां से बाद में उन्हें गोंदिया जेल भेज दिया गया। इसी दौरान उनके गांव गोरकापार की संत प्रवृत्ति की महिला महात्मा दाई से जुड़ी एक घटना सामने आती है। बताया जाता है कि महात्मा दाई ने ग्रामीणों को कहा था कि वली मुहम्मद जन्माष्टमी के दिन जेल से रिहा होकर वापस आएंगे। उनके वंशजों और स्थानीय इतिहास से जुड़े विवरणों के अनुसार, बाद में ऐसा ही हुआ और वली मुहम्मद जन्माष्टमी के दिन अंग्रेजों की कैद से रिहा होकर गोरकापार पहुंचे। रिहाई के बाद जब वली मुहम्मद ने महात्मा दाई से मुलाकात की और उनसे इस भविष्यवाणी के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि उन्हें स्वप्न में महात्मा गांधी के दर्शन हुए थे और बापू ने ही यह बात कही थी। इस घटना की चर्चा धीरे-धीरे आसपास के क्षेत्रों में फैलने लगी। स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े लोग महात्मा दाई और वली मुहम्मद से मिलने गोरकापार पहुंचने लगे। कहा जाता है कि इसी घटना और गांधीजी के प्रति ग्रामीणों की गहरी आस्था के कारण गांव का नाम ‘गांधी गोरकापार’ प्रचलित हो गया, जो आज भी कायम है।

डौंडी लोहारा बना कर्मभूमि, करीब 100 लोगों को आंदोलन से जोड़ा

स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाने के बाद वली मुहम्मद ने डौंडी लोहारा को अपना कर्मक्षेत्र बनाया। उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार, उन्होंने डौंडी लोहारा जमींदारी क्षेत्र में स्वतंत्रता आंदोलन के लिए लोगों को एकजुट किया। उनके प्रयासों से करीब 100 लोगों ने उनके साथ जेल यात्रा की। स्वतंत्रता आंदोलन में उनके प्रमुख सहयोगियों में बालोद के स्व. सरयू प्रसाद वकील का नाम भी उल्लेखित मिलता है। वहीं कुटेरा के स्व. कृष्णाराम ठाकुर और भेड़ी गांव के रामदयाल जैसे लोगों ने भी उनसे प्रेरणा लेकर जंगल सत्याग्रह में भाग लिया। इस तरह वली मुहम्मद केवल स्वयं स्वतंत्रता आंदोलन के सेनानी नहीं रहे, बल्कि उन्होंने अपने आसपास के लोगों को भी राष्ट्रीय आंदोलन से जोड़ने का महत्वपूर्ण कार्य किया।

अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ मुखर आवाज, कई बार गए जेल

स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान वली मुहम्मद अंग्रेजी शासन के खिलाफ लगातार सक्रिय रहे। उनके वंशजों के पास सुरक्षित दस्तावेजों के अनुसार, अंग्रेजी शासन के विरोध के चलते उन्हें 7 मार्च 1923 को गिरफ्तार कर नागपुर जेल भेजा गया। इसके बाद 23 जुलाई 1923 को उन्हें अकोला नागपुर स्थानांतरित किया गया। इसके अलावा 23 अक्टूबर 1939 से 24 नवंबर 1939 तक उन्हें रायपुर केंद्रीय जेल में रखा गया। स्वतंत्रता आंदोलन के अंतिम दौर में भी अंग्रेजी शासन ने उन्हें नहीं छोड़ा और वर्ष 1943 से 1945 तक करीब दो वर्षों तक नागपुर जेल में कैद रखा गया। इन जेल यात्राओं से स्पष्ट होता है कि स्वतंत्रता संग्राम में उनका योगदान केवल प्रतीकात्मक नहीं था, बल्कि उन्होंने अंग्रेजी शासन के खिलाफ सक्रिय संघर्ष करते हुए लंबे समय तक जेल की यातनाएं सहीं।24 जुलाई 1957 को डौंडी लोहारा में उनका निधन हुआ।

ताम्रपत्र में दर्ज है बालोद की आजादी की कहानी

देश आजाद हुआ तो स्वतंत्रता संग्राम में वली मुहम्मद के योगदान को भी सम्मान मिला। 15 अगस्त 1947 को उन्हें स्वतंत्रता संग्राम में उनके योगदान के लिए ताम्रपत्र प्रदान किया गया। इस ताम्रपत्र पर महाकौशल प्रांतीय कांग्रेस कमेटी जबलपुर के सभापति सेठ गोविंददास के हस्ताक्षर होने की जानकारी दी गई है। आज यह ऐतिहासिक ताम्रपत्र उनके वंशजों के पास सुरक्षित है। यह केवल परिवार की धरोहर नहीं, बल्कि बालोद जिले और पूरे क्षेत्र के स्वतंत्रता आंदोलन का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है। इस ताम्रपत्र में दर्ज इतिहास उस दौर की याद दिलाता है, जब देश की आजादी के लिए गांवों से भी आवाज उठ रही थी और लोग अपने सुख-सुविधाओं को छोड़कर अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ संघर्ष कर रहे थे।  

गांव का नाम आज भी सुनाता है आजादी की कहानी

‘गांधी गोरकापार’ केवल एक गांव का नाम नहीं है। यह नाम अपने भीतर करीब सौ साल पुरानी एक ऐसी कहानी समेटे हुए है, जिसमें एक अंग्रेजी हुकूमत का कर्मचारी गांधीजी के विचारों से प्रभावित होकर स्वतंत्रता आंदोलन का सिपाही बन गया। जिसने जेल की सलाखों के पीछे समय बिताया, लोगों को आंदोलन से जोड़ा और आजादी के बाद ताम्रपत्र से सम्मानित हुआ। आज जब स्वतंत्रता दिवस पर पूरा देश तिरंगे को सलाम करता है, तब ‘गांधी गोरकापार’ की मिट्टी हमें याद दिलाती है कि आजादी की लड़ाई केवल बड़े शहरों और प्रसिद्ध नेताओं की कहानी नहीं थी। इस लड़ाई में बालोद के गांवों की मिट्टी भी शामिल थी, जहां वली मुहम्मद जैसे वीरों ने अपना सब कुछ देश के नाम कर दिया था। ताम्रपत्र में दर्ज यह कहानी केवल एक परिवार की धरोहर नहीं, बल्कि बालोद की आजादी की अमर विरासत है। जरूरत है कि ऐसे दस्तावेजों को सुरक्षित किया जाए, इन सेनानियों के इतिहास को नई पीढ़ी तक पहुंचाया जाए और उनके नाम को आने वाली पीढ़ियों की स्मृति में जीवित रखा जाए।

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