नारी शिक्षा और स्वतंत्रता के प्रबल पक्षधर रहे बालोद अंचल के इस कर्मयोगी ने सैकड़ों युवाओं को देशसेवा के लिए किया प्रेरित

Darshan Balod
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शिक्षक बने देशभक्ति के प्रहरी, जंगलों में घूमकर जलाए आजादी के आंदोलन की लौ, लक्ष्मण प्रसाद दुबे ‘गुरुजी’ ने पढ़ाई के साथ स्वतंत्रता संग्राम की अलख जगाई, गिरफ्तारी से बचने 1942 से 1947 तक बिताया भूमिगत जीवन

बालोद। स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में कुछ ऐसे सेनानी भी रहे, जिन्होंने हाथ में हथियार नहीं, बल्कि शिक्षा, विचार और जनजागरण को अपना अस्त्र बनाया। उन्होंने अपने शिक्षकीय कर्तव्य को केवल नौकरी नहीं, बल्कि राष्ट्रसेवा की साधना माना। ऐसे ही कर्मयोगी थे लक्ष्मण प्रसाद दुबे, जिन्हें लोग स्नेह और सम्मान से ‘गुरुजी’ कहकर पुकारते थे। उनका संपूर्ण जीवन शिक्षकीय दायित्व निभाते हुए बीता, लेकिन इसके साथ ही उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन की अलख जगाने और युवाओं के मन में देशभक्ति की भावना पैदा करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।उन्होंने अपने जीवन में अनेक विद्यार्थियों को शिक्षा दी और उनके भीतर देशप्रेम की भावना जागृत की। इतना ही नहीं, उनके व्यक्तित्व से प्रेरित होकर कई लोगों ने आगे चलकर शिक्षकीय जीवन को अपनाया। नारी स्वतंत्रता और नारी शिक्षा के प्रबल पक्षधर लक्ष्मण प्रसाद दुबे का जन्म 9 जून 1909 को छत्तीसगढ़ के तत्कालीन दुर्ग जिले के दाढ़ी गांव में हुआ था। गांव में प्राथमिक शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने बेमेतरा से उच्चतर माध्यमिक शिक्षा और शिक्षक प्रशिक्षण प्राप्त किया तथा शिक्षकीय जीवन प्रारंभ किया।

1929 में भिलाई में शिक्षक बने, यहीं से स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ाव

लक्ष्मण प्रसाद दुबे की पहली नियमित पदस्थापना वर्ष 1929 में भिलाई के माध्यमिक स्कूल में हुई। उस समय दुर्ग अंचल में स्वतंत्रता आंदोलन की लहर तेजी से फैल रही थी। भिलाई में शिक्षक के रूप में कार्य करते हुए उनका संपर्क जिले के वरिष्ठ सत्याग्रही नरसिंह प्रसाद अग्रवाल से हुआ। उस दौर में किशोरों और युवाओं के बीच अग्रवाल जी का विशेष प्रभाव था। उनके मार्गदर्शन और प्रेरणा से लक्ष्मण प्रसाद दुबे ने अपने साथियों और विद्यार्थियों के साथ मिलकर मद्य निषेध आंदोलन और विदेशी वस्त्र बहिष्कार आंदोलन को आगे बढ़ाने का काम शुरू किया। इसी दौरान उन्होंने भिलाई में विदेशी वस्तुओं के साथ जार्ज पंचम का चित्र भी जलाया। अंग्रेजी शासन को इसकी भनक लगी तो अक्टूबर 1929 में भिलाई का मिडिल स्कूल बंद कर दिया गया और उनका स्थानांतरण बालोद मिडिल स्कूल कर दिया गया। लेकिन यह स्थानांतरण उनके लिए एक नए अध्याय की शुरुआत बन गया, क्योंकि उनके प्रेरणास्रोत नरसिंह प्रसाद अग्रवाल बालोद के मूल निवासी थे। अब लक्ष्मण प्रसाद दुबे को अपने नेता और मार्गदर्शक के और करीब रहकर स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाने का अवसर मिला।

बालोद के पोड़ी गांव के जंगल सत्याग्रह की संभाली जिम्मेदारी

बालोद के ग्राम पोड़ी में हुए जंगल सत्याग्रह की पूरी रूपरेखा और उससे संबंधित दस्तावेज नरसिंह प्रसाद अग्रवाल ने लक्ष्मण प्रसाद दुबे को सौंपे थे। अंग्रेजी शासन की पुलिस और गुप्तचरों से इन दस्तावेजों को बचाते हुए वे जंगल सत्याग्रह और स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ी गतिविधियों का विवरण एक रजिस्टर में दर्ज करते रहे। नरसिंह प्रसाद अग्रवाल के जेल जाने के बाद भी लक्ष्मण प्रसाद दुबे ने जंगल सत्याग्रह की गतिविधियों को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वे बताया करते थे कि उस दौर में सत्याग्रह की रैलियों और सभाओं में 8 से 10 महिलाएं भी चरखा लेकर शामिल होती थीं और आंदोलन में अपनी सक्रिय भागीदारी दर्ज कराती थीं। यह उस समय के सामाजिक बदलाव की भी तस्वीर थी, जब स्वतंत्रता आंदोलन के साथ-साथ महिलाओं की भागीदारी और स्वदेशी की भावना भी ग्रामीण क्षेत्रों में मजबूत हो रही थी।

बालोद से दुर्ग और धमधा तक पैदल पहुंचाते रहे आंदोलन का संदेश

वर्ष 1930 में बालोद के सर्किल ऑफिसर नायडू से उनकी बहस हो गई। इसके बाद अग्रवाल परिवार की मध्यस्थता से उनका स्थानांतरण धमधा कर दिया गया। इसके बाद उनका आवागमन बालोद, दुर्ग, धमधा और दाढ़ी के बीच बना रहा। इस दौरान वे विश्वनाथ तामस्कर, रघुनंदन प्रसाद सिंगरौल और लक्ष्मण प्रसाद बैद जैसे स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े कार्यकर्ताओं के साथ सक्रिय रहे। नरसिंह प्रसाद अग्रवाल के इस क्षेत्र में होने वाले दौरों की जिम्मेदारी भी काफी हद तक लक्ष्मण प्रसाद दुबे के पास रहती थी। वर्ष 1932 में अग्रवाल जी के दाढ़ी दौरे के दौरान भी वे उनके साथ सक्रिय रहे। नरसिंह प्रसाद अग्रवाल युवा सत्याग्रहियों को हमेशा समझाया करते थे कि ‘जोश के साथ होश मत खोना।’ उस समय अंग्रेजी शासन की नजर स्वतंत्रता आंदोलन के प्रमुख नेताओं पर थी और लगातार गिरफ्तारियां हो रही थीं। ऐसे समय में आंदोलन को जीवित रखने के लिए दूसरी पंक्ति के कार्यकर्ताओं की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण थी। लक्ष्मण प्रसाद दुबे ने इसी जिम्मेदारी को गांधीवादी और संयमित तरीके से निभाया।

डौंडी-लोहारा के जंगलों में भी जारी रखा जनजागरण

वर्ष 1942 में उनका स्थानांतरण डौंडी-लोहारा कर दिया गया। जंगल सत्याग्रह की रणनीति और ग्रामीण जनजागरण में दक्ष लक्ष्मण प्रसाद दुबे के लिए यह क्षेत्र भी उनके कार्य का महत्वपूर्ण केंद्र बन गया। डौंडी-लोहारा के जंगलों और ग्रामीण अंचलों में वे अपने शिक्षकीय दायित्व के साथ-साथ पैदल गांव-गांव घूमते और लोगों को स्वतंत्रता आंदोलन का संदेश देते रहे। इस दौरान भी उन्हें नरसिंह प्रसाद अग्रवाल का मार्गदर्शन मिलता रहा। लेकिन अंग्रेजी शासन उनकी गतिविधियों पर नजर रख रहा था।

गिरफ्तारी का आदेश जारी हुआ तो स्कूल से इस्तीफा देकर हो गए भूमिगत

वर्ष 1942 में जमुना प्रसाद अग्रवाल अपने बड़े भाई नरसिंह प्रसाद अग्रवाल का संदेश लेकर लक्ष्मण प्रसाद दुबे के पास पहुंचे। उन्होंने उन्हें चेतावनी दी कि अंग्रेजी सरकार कभी भी उन्हें गिरफ्तार कर सकती है। जमुना प्रसाद अग्रवाल के बालोद लौटते ही उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। इसी रात लक्ष्मण प्रसाद दुबे को गिरफ्तार करने का आदेश डौंडी में भी जारी कर दिया गया। हालांकि गिरफ्तारी का आदेश लागू होने से पहले ही इसकी जानकारी एक सिपाही के माध्यम से लीक हो गई। स्थिति को भांपते हुए लक्ष्मण प्रसाद दुबे ने अपने स्कूल का त्यागपत्र मित्रों के हाथों सौंप दिया और वहां से निकलकर बालोद पहुंचे। इसके बाद वे भूमिगत हो गए। रायपुर के प्रमुख सक्रिय स्वतंत्रता संग्राम सेनानी स्व. मोतीलाल त्रिपाठी से उनके पारिवारिक संबंधों का लाभ भी उन्हें मिला। इसके बाद उन्होंने दुर्ग जिले के दूरस्थ और घने जंगल क्षेत्रों में रहकर स्वतंत्रता आंदोलन की लौ को जलाए रखने का काम जारी रखा।

1942 से 1947 तक खानाबदोश की तरह घूमते रहे

अंग्रेजी शासन की गिरफ्तारी से बचते हुए वर्ष 1942 से 1947 तक उन्होंने लगभग खानाबदोश जीवन व्यतीत किया। वे दुर्ग जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में पैदल घूम-घूमकर लोगों के बीच सत्याग्रह और स्वतंत्रता आंदोलन की शिक्षा का संदेश पहुंचाते रहे। उनकी सक्रियता और जनसंपर्क का ही परिणाम था कि वे लगातार अंग्रेजी पुलिस की नजर से बचते हुए आंदोलन की गतिविधियों को आगे बढ़ाते रहे। एक शिक्षक के रूप में उनका ज्ञान और एक स्वतंत्रता सेनानी के रूप में उनका साहस, दोनों मिलकर उन्हें अपने समय का विशिष्ट व्यक्तित्व बनाते थे।

शिक्षक के साथ ज्योतिष और चिकित्सा के भी विद्वान

लक्ष्मण प्रसाद दुबे का व्यक्तित्व बहुआयामी था। वे ज्योतिष के विद्वान थे। उन्होंने यूनानी चिकित्सा और वैद विशारद की परीक्षाएं भी उत्तीर्ण की थीं। शिक्षा के साथ-साथ उन्होंने चिकित्सा सेवा के क्षेत्र में भी कार्य किया। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद उन्होंने जनपद पंचायत स्कूल में प्रधान पाठक के रूप में अपनी सेवाएं दीं। सेवानिवृत्ति के बाद भी उनका सार्वजनिक जीवन सक्रिय रहा और वे जनपद पंचायत बेमेतरा के सदस्य भी रहे।

कांग्रेस से जुड़े रहे, अंतिम समय तक निभाई सक्रिय भूमिका

लक्ष्मण प्रसाद दुबे ने वर्ष 1930 में दुर्ग जिला कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण की थी। वर्ष 1942 से 1947 तक वे जिला कांग्रेस की कार्यकारिणी के सदस्य के रूप में सक्रिय रहे। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी उनका कांग्रेस और सार्वजनिक जीवन से जुड़ाव बना रहा और 23 जुलाई 1993 को अपने निधन तक वे जिला कांग्रेस के सक्रिय सदस्य रहे। उनका जीवन इस बात का उदाहरण है कि स्वतंत्रता आंदोलन में योगदान देने के अनेक रास्ते थे। किसी ने जेल जाकर संघर्ष किया, किसी ने सत्याग्रह किया तो किसी ने गांव-गांव घूमकर जनजागरण किया। लक्ष्मण प्रसाद दुबे ने शिक्षक के रूप में अपनी भूमिका को ही स्वतंत्रता आंदोलन का माध्यम बना लिया था। उनकी कहानी हमें यह भी बताती है कि आजादी की लड़ाई में बालोद, दुर्ग और डौंडी-लोहारा जैसे अंचलों के शिक्षकों, विद्यार्थियों, महिलाओं और ग्रामीणों ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। ऐसे अल्पज्ञात स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के संघर्ष और योगदान को इतिहास के पन्नों में सुरक्षित रखना और नई पीढ़ी तक पहुंचाना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

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