दुर्ग जिले के पहले गांधीवादी स्वतंत्रता सेनानी थे दाऊ ढालसिंह दिलीवार, अब उनके नाम पर अलंकरण पुरस्कार की मांग
बालोद। छत्तीसगढ़ के स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास केवल बड़े शहरों और चर्चित नेताओं के संघर्ष तक सीमित नहीं है। गांवों और ग्रामीण अंचलों से भी अनेक ऐसे वीर सपूत निकले, जिन्होंने महात्मा गांधी के सत्य, अहिंसा और असहयोग के सिद्धांतों से प्रेरित होकर अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ संघर्ष किया और देश की आजादी के लिए जेल की यातनाएं सहीं। ऐसे ही महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे दाऊ ढालसिंह दिलीवार, जिन्होंने अपना जीवन राष्ट्रसेवा और स्वतंत्रता आंदोलन के लिए समर्पित कर दिया। वरिष्ठ स्वतंत्रता संग्राम सेनानी जमुना प्रसाद कासर ने अपनी पुस्तक में उन्हें दुर्ग जिले का पहला गांधीवादी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी बताया है।
पिरिद गांव में जन्मे, अर्जुंदा और राजनांदगांव में हुई शिक्षा
दाऊ ढालसिंह दिलीवार का जन्म 27 नवंबर 1897 को तत्कालीन दुर्ग जिले के गुंडरदेही तहसील अंतर्गत ग्राम पिरिद में एक मालगुजार परिवार में हुआ था। उन्होंने अपनी मिडिल स्कूल की शिक्षा अर्जुंदा से तथा हाईस्कूल की शिक्षा राजनांदगांव से पूरी की। शिक्षा के दौरान ही वे देश की तत्कालीन परिस्थितियों और महात्मा गांधी के विचारों से प्रभावित हुए। सत्य, अहिंसा और असहयोग के गांधीवादी सिद्धांतों ने उनके जीवन की दिशा बदल दी और उन्होंने देश को अंग्रेजी शासन से मुक्त कराने के राष्ट्रीय आंदोलन में सक्रिय भागीदारी का संकल्प लिया।
1926 में स्वतंत्रता आंदोलन में कूदे, गांव-गांव पहुंचाया राष्ट्रीय चेतना का संदेश
दाऊ ढालसिंह दिलीवार वर्ष 1926 में स्वतंत्रता आंदोलन से सक्रिय रूप से जुड़ गए। ग्रामीण अंचल की परिस्थितियों और आमजन के जीवन की उन्हें गहरी समझ थी। इसी कारण वे ग्रामीण क्षेत्रों में राष्ट्रीय चेतना जगाने और लोगों को स्वतंत्रता आंदोलन से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने लगे। उनके व्यक्तित्व में निर्भीकता, नेतृत्व क्षमता और जनसेवा की भावना का अद्भुत समन्वय था। वर्ष 1935 में वे कांग्रेस सेवा दल से जुड़े और महात्मा गांधी के सत्याग्रह आंदोलन से प्रेरणा लेकर स्वतंत्रता संग्राम में अपनी सक्रियता और तेज कर दी। उनके व्यापक जनसंपर्क और ग्रामीण क्षेत्रों की गहरी जानकारी को देखते हुए वर्ष 1937 में उन्हें प्रांतीय कांग्रेस समिति (एमपी कांग्रेस कमेटी) का सदस्य बनाया गया। इसी वर्ष उन्होंने दुर्ग जिला लोकल बोर्ड के अध्यक्ष का दायित्व भी संभाला।
अंग्रेजी हुकूमत की आंखों में खटकने लगे थे दाऊ ढालसिंह
स्वतंत्रता आंदोलन में उनकी बढ़ती सक्रियता और निर्भीक नेतृत्व अंग्रेजी शासन को रास नहीं आया। वे अंग्रेजी अधिकारियों की नजर में ऐसे प्रभावशाली नेता बन चुके थे, जो ग्रामीण जनता को राष्ट्रीय आंदोलन से जोड़ने और अंग्रेजी शासन के खिलाफ जनमत तैयार करने में सक्षम थे। वर्ष 1941 में गांधी चौक की एक सभा के दौरान अंग्रेजी शासन ने उन्हें बलपूर्वक गिरफ्तार कर लिया। इसके बाद 12 मई 1941 को उन्हें नागपुर जेल भेजा गया। बाद में उन्हें अलग-अलग जेलों में स्थानांतरित किया गया और वे नागपुर, दमोह तथा जबलपुर की जेलों सहित वर्ष 1941 से 1945 तक करीब चार वर्षों तक कैद रहे। लंबे कारावास और अंग्रेजी शासन के दमन के बावजूद उनके भीतर देश की आजादी के प्रति समर्पण और गांधीवादी विचारों के प्रति आस्था कभी कमजोर नहीं हुई।
गांधी चौक की सभा से गिरफ्तारी का उल्लेख इतिहास में दर्ज
वरिष्ठ स्वतंत्रता संग्राम सेनानी जमुना प्रसाद कासर ने अपनी पुस्तक में दाऊ ढालसिंह दिलीवार की गिरफ्तारी की इस महत्वपूर्ण घटना का उल्लेख किया है। उनके अनुसार, वर्ष 1941 में गांधी चौक में आयोजित सभा से दाऊ ढालसिंह को अंग्रेजी शासन द्वारा जबरन गिरफ्तार किया गया था। यह घटना उनके निर्भीक व्यक्तित्व और अंग्रेजी शासन के खिलाफ उनके मुखर संघर्ष का प्रमाण है। जमुना प्रसाद कासर ने उन्हें दुर्ग जिले का पहला गांधीवादी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी बताते हुए उनके योगदान को विशेष रूप से रेखांकित किया है।
सादगी, ईमानदारी और न्यायप्रियता थी पहचान
दाऊ ढालसिंह दिलीवार का व्यक्तित्व केवल एक स्वतंत्रता सेनानी तक सीमित नहीं था। वे जीवंत, आदर्शवादी, ईमानदार, निष्पक्ष, न्यायप्रिय, उदार, मृदुभाषी और विनम्र स्वभाव के व्यक्ति थे। उनमें असाधारण नेतृत्व क्षमता और प्रशासनिक दक्षता थी। उनकी सादगी और सहज व्यवहार ने उन्हें आम लोगों के बीच लोकप्रिय बनाया और वे अनेक लोगों के लिए प्रेरणास्रोत बने। उनका संघर्ष केवल अंग्रेजी शासन के खिलाफ राजनीतिक लड़ाई तक सीमित नहीं था, बल्कि वे समाज में न्याय, समानता और जनहित के मूल्यों को मजबूत करने के भी पक्षधर थे। उनका जीवन इस बात का उदाहरण है कि स्वतंत्रता आंदोलन में गांधीवादी विचारों को अपनाकर भी दृढ़ संकल्प और साहस के साथ अंग्रेजी शासन का मुकाबला किया जा सकता है।
10 अगस्त 1969 को हुआ निधन, लेकिन संघर्ष की गाथा आज भी जीवंत
दाऊ ढालसिंह दिलीवार का निधन 10 अगस्त 1969 को हुआ, लेकिन देश की आजादी के लिए उनके संघर्ष और योगदान की स्मृति आज भी प्रेरणा देती है। ग्राम पिरिद से निकलकर राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन में अपनी पहचान बनाने वाले इस गांधीवादी सेनानी ने सत्य, अहिंसा, जनसेवा और राष्ट्रभक्ति के मूल्यों को अपने जीवन में सर्वोच्च स्थान दिया। स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर दाऊ ढालसिंह दिलीवार जैसे सेनानियों को याद करना इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि भारत की आजादी केवल कुछ बड़े नेताओं के संघर्ष का परिणाम नहीं थी। गांव-गांव और कस्बे-कस्बे में रहने वाले असंख्य ज्ञात-अल्पज्ञात सेनानियों के त्याग, संघर्ष और जेल यात्राओं ने स्वतंत्रता की नींव को मजबूत किया था। ऐसे सेनानियों की गाथाओं को नई पीढ़ी तक पहुंचाना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
दाऊ ढालसिंह दिलीवार के नाम पर अलंकरण पुरस्कार घोषित करने की मांग
छत्तीसगढ़ प्रदेश कुर्मी क्षत्रिय समाज के प्रदेश युवा अध्यक्ष योगेश्वर देशमुख ने कहा कि दाऊ ढालसिंह दिलीवार जैसे महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी का योगदान समाज और प्रदेश के लिए गौरव का विषय है। उन्होंने बताया कि समय-समय पर शासन-प्रशासन से स्वर्गीय दाऊ ढालसिंह दिलीवार के नाम पर अलंकरण पुरस्कार घोषित करने की मांग की जाती रही है। उनका कहना है कि ऐसे महान स्वतंत्रता सेनानी के नाम पर पुरस्कार की स्थापना होने से उनके योगदान को सम्मान मिलेगा और समाज में राष्ट्रसेवा, जनसेवा तथा देशभक्ति के लिए कार्य करने वाले लोगों को प्रेरणा मिलेगी। उन्होंने कहा कि दाऊ ढालसिंह दिलीवार के नाम पर अलंकरण पुरस्कार की शुरुआत उनके संघर्ष और योगदान को चिरस्थायी सम्मान देने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम होगा। इससे आने वाली पीढ़ियां भी उनके जीवन और स्वतंत्रता संग्राम में दिए गए योगदान से परिचित होंगी और उनके आदर्शों से प्रेरणा लेकर राष्ट्र एवं समाज के प्रति अपने दायित्वों का निर्वहन करने के लिए आगे आएंगी। दाऊ ढालसिंह दिलीवार की कहानी केवल इतिहास का एक अध्याय नहीं, बल्कि आज भी यह संदेश देती है कि सत्य, अहिंसा, साहस और राष्ट्रप्रेम के रास्ते पर चलकर एक सामान्य व्यक्ति भी देश के इतिहास में असाधारण योगदान दे सकता है।
