1920 में महात्मा गांधी के धमतरी आगमन की ऐतिहासिक घटना में दर्ज है बालोद अंचल के इस अल्पज्ञात स्वतंत्रता संग्राम सेनानी का नाम

Darshan Balod
0

 


धमतरी में गांधीजी को कंधे पर उठाकर मंच तक पहुंचाने वाले थे गुरूर के उमर सेठ

बालोद/गुरूर। स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास केवल देश के बड़े नेताओं और चर्चित आंदोलनों तक सीमित नहीं है। आजादी की इस महान लड़ाई में देश के गांवों, कस्बों और छोटे-छोटे शहरों के अनगिनत लोगों ने भी अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया था। इनमें से कई ऐसे नायक हैं, जिनका नाम इतिहास के बड़े पन्नों में भले ही बहुत अधिक चर्चित नहीं हुआ, लेकिन उनके साहस और राष्ट्रभक्ति से जुड़ी घटनाएं आज भी इतिहास के दस्तावेजों में सुरक्षित हैं। गुरूर के उमर सेठ भी ऐसे ही एक अल्पज्ञात स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे, जिनका नाम महात्मा गांधी के वर्ष 1920 में धमतरी आगमन से जुड़ी एक बेहद रोचक और ऐतिहासिक घटना में दर्ज है। यह वह दौर था, जब देश में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ स्वतंत्रता आंदोलन तेजी से जन आंदोलन का रूप ले रहा था। महात्मा गांधी देशभर में लोगों को सत्य, अहिंसा और असहयोग के रास्ते पर चलकर अंग्रेजी शासन के खिलाफ संघर्ष के लिए प्रेरित कर रहे थे। इसी क्रम में 21 दिसंबर 1920 को महात्मा गांधी मौलाना शौकत अली के साथ रायपुर होते हुए धमतरी पहुंचे थे। गांधीजी के धमतरी आने की खबर पहले से ही लोगों तक पहुंच चुकी थी। उनके दर्शन करने और उनका भाषण सुनने के लिए धमतरी तहसील के गांव-गांव से बड़ी संख्या में स्त्री-पुरुष नगर में उमड़ पड़े। गांधीजी के स्वागत में पूरा शहर राष्ट्रभक्ति के रंग में रंग गया था। ‘वंदे मातरम्’, ‘भारत माता की जय’ और ‘महात्मा गांधी की जय’ के नारों से धमतरी की सड़कें गूंज उठी थीं।

धमतरी में उमड़ा था जनसैलाब, गांधीजी का मंच तक पहुंचना हुआ मुश्किल


महात्मा गांधी के भाषण के लिए धमतरी के एक प्रमुख सेठ के विशाल बाड़े में सभा का आयोजन किया गया था। गांधीजी की खुली कार जब लोगों की भारी भीड़ को पार करती हुई सभा स्थल के पास पहुंची, तो वहां मौजूद जनसैलाब के कारण आगे बढ़ना बेहद मुश्किल हो गया। सभा स्थल का मुख्य द्वार भी लोगों से पूरी तरह भरा हुआ था। गांधीजी को मंच तक पहुंचाना उस समय एक बड़ी चुनौती बन गया। तभी गुरूर निवासी उमर सेठ आगे आए। ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, उमर सेठ एक कच्छी व्यापारी थे और गांधीजी के प्रति उनके मन में गहरी श्रद्धा थी। उन्होंने बिना किसी संकोच के महात्मा गांधी को अपने कंधों पर उठा लिया और भीड़ के बीच से गुजरते हुए उन्हें सभा के मंच तक पहुंचाया।गांधीजी के मंच पर पहुंचते ही वहां मौजूद लोगों में उत्साह की लहर दौड़ गई। हजारों की भीड़ अपने प्रिय नेता की एक झलक पाने और उनका संदेश सुनने के लिए आतुर थी। उस समय उमर सेठ द्वारा गांधीजी को कंधे पर उठाकर मंच तक पहुंचाने का यह प्रसंग स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान स्थानीय जनमानस में महात्मा गांधी के प्रति मौजूद गहरी आस्था और सम्मान का प्रतीक बन गया।

गुरूर के उमर सेठ की यह पहल बन गई इतिहास का हिस्सा

आजादी के आंदोलन के इतिहास में उमर सेठ का नाम भले ही व्यापक रूप से चर्चित नहीं है, लेकिन गांधीजी के धमतरी आगमन की इस घटना ने उन्हें इतिहास के एक महत्वपूर्ण प्रसंग से जोड़ दिया। यह घटना बताती है कि स्वतंत्रता आंदोलन में स्थानीय स्तर पर सक्रिय लोगों की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण थी।गुरूर के उमर सेठ ने उस समय गांधीजी को अपने कंधों पर उठाकर केवल एक व्यक्ति को मंच तक नहीं पहुंचाया था, बल्कि यह उस दौर में महात्मा गांधी और स्वतंत्रता आंदोलन के प्रति आम लोगों की गहरी श्रद्धा और समर्पण का भी प्रतीक था।

डेढ़ मील लंबी सड़क पर गूंज रहे थे देशभक्ति के नारे

गांधीजी के स्वागत के लिए धमतरी की करीब डेढ़ मील लंबी सड़क के दोनों ओर लोग खड़े थे। गांवों से आए हजारों स्त्री-पुरुष गांधीजी के स्वागत के लिए घंटों से प्रतीक्षा कर रहे थे। जैसे ही गांधीजी का काफिला आगे बढ़ा, पूरा वातावरण वंदे मातरम् और भारत माता की जय के नारों से गूंज उठा। सभा के लिए बनाए गए मंच को तोरण-पताकाओं, देशभक्त नेताओं के चित्रों और देशभक्ति से जुड़े प्रेरणादायक संदेशों से सजाया गया था। गांधीजी के मंच पर पहुंचने के बाद नगरवासियों की ओर से उनका स्वागत किया गया और 501 रुपये की थैली भेंट की गई। उस समय यह राशि राष्ट्रीय आंदोलन के प्रति स्थानीय लोगों के आर्थिक सहयोग और समर्पण का महत्वपूर्ण प्रतीक थी।

गांधीजी ने कंडेल नहर सत्याग्रह का किया उल्लेख

सभा को संबोधित करते हुए महात्मा गांधी ने करीब एक घंटे तक देश की तत्कालीन परिस्थितियों और स्वतंत्रता आंदोलन की दिशा पर चर्चा की। अपने भाषण में उन्होंने कंडेल गांव के नहर सत्याग्रह का उल्लेख किया और उससे जुड़े प्रमुख आंदोलनकारियों के योगदान को भी याद किया। गांधीजी ने पंडित सुंदरलाल शर्मा, पंडित नारायण राव मेघावाले, नत्थूजी जगताप और छोटेलाल बाबू सहित आंदोलन से जुड़े अन्य लोगों का उल्लेख करते हुए जनता को अन्याय और अत्याचार के खिलाफ संगठित होकर संघर्ष करने का संदेश दिया। उन्होंने सत्य, अहिंसा, दृढ़ता और शांतिपूर्ण आंदोलन को ही देश के उज्ज्वल भविष्य का मार्ग बताया।गांधीजी का यह संदेश धमतरी ही नहीं, बल्कि आसपास के क्षेत्रों में भी स्वतंत्रता आंदोलन की चेतना को मजबूत करने वाला साबित हुआ।

बालोद अंचल तक पहुंची थी स्वतंत्रता आंदोलन की लहर

महात्मा गांधी के छत्तीसगढ़ प्रवास के दौरान स्वतंत्रता आंदोलन की गतिविधियां रायपुर और धमतरी के साथ-साथ आसपास के अनेक क्षेत्रों में भी तेज हुईं। रायपुर, धमतरी, कुरूद, आरंग, गनौद, दुर्ग, महासमुंद, बालोद, राजिम, राजनांदगांव, बिलासपुर, कांकेर, डौंडी, भानुप्रतापपुर और जगदलपुर सहित अनेक स्थानों पर राष्ट्रीय आंदोलन की गतिविधियों ने लोगों को जोड़ने का काम किया।स्थानीय कार्यकर्ताओं, मालगुजारों, व्यापारियों और ग्रामीणों ने गांव-गांव जाकर जनजागृति का कार्य किया। स्वतंत्रता आंदोलन के इन स्थानीय नायकों ने आम लोगों को अंग्रेजी शासन के खिलाफ एकजुट करने और राष्ट्रीय चेतना जगाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसी व्यापक जनजागरण की कड़ी में गुरूर के उमर सेठ जैसे राष्ट्रभक्तों का योगदान भी महत्वपूर्ण रहा, जिनकी भूमिका भले ही इतिहास के बड़े पन्नों में सीमित दिखाई देती हो, लेकिन उनकी कहानी स्वतंत्रता आंदोलन के स्थानीय इतिहास को समझने के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।

इतिहास के पन्नों से फिर सामने आना चाहिए गुरूर के उमर सेठ का नाम

आज स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर जब हम देश की आजादी का उत्सव मनाते हैं, तब यह भी हमारा दायित्व है कि उन अल्पज्ञात और गुमनाम स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को याद करें, जिनके योगदान के बिना आजादी की कहानी अधूरी है। गुरूर के उमर सेठ की कहानी इसी भूले-बिसरे इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय है। वर्ष 1920 में धमतरी में जब महात्मा गांधी के स्वागत के लिए हजारों लोगों का जनसैलाब उमड़ा था और बापू का मंच तक पहुंचना मुश्किल हो गया था, तब गुरूर के उमर सेठ ने उन्हें अपने कंधों पर उठाकर मंच तक पहुंचाया। यह घटना केवल एक ऐतिहासिक प्रसंग नहीं, बल्कि उस दौर की राष्ट्रभक्ति, जनआस्था और स्वतंत्रता आंदोलन के प्रति लोगों के समर्पण की जीवंत तस्वीर है। आज आवश्यकता है कि बालोद जिले और आसपास के अंचलों में स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े ऐसे अल्पज्ञात नायकों की खोज की जाए। पुराने दस्तावेजों, सरकारी अभिलेखों, परिवारों के पास सुरक्षित प्रमाणों और स्थानीय इतिहास में दर्ज घटनाओं को संजोकर नई पीढ़ी तक पहुंचाया जाए, ताकि आजादी की लड़ाई में हमारे गांवों और कस्बों की भूमिका भी इतिहास के सामने पूरी मजबूती से आ सके। गुरूर के उमर सेठ जैसे नायक हमें याद दिलाते हैं कि भारत की आजादी केवल कुछ महान नेताओं के संघर्ष का परिणाम नहीं थी, बल्कि यह उन अनगिनत देशभक्तों के त्याग, समर्पण और साहस से हासिल हुई, जिनकी कहानियां आज भी हमारी मिट्टी में जीवित हैं। आजादी के इस पर्व पर ऐसे गुमनाम और अल्पज्ञात नायकों को नमन, जिन्होंने अपने समय में राष्ट्र के लिए जो किया, वही हमारी स्वतंत्रता की अमर विरासत है।

साभार : डॉ. प्रकाश पतंगीवार, ‘गुरूर गौरव’ संपादक शांति कॉलोनी रायपुर

डॉ कुबेर सिंग गुरुपंच, प्रोफेसर शासकीय दिग्विजय स्वशासी स्नातकोत्तर महाविद्यालय, राजनांदगांव, छत्तीसगढ़।

Post a Comment

0 Comments

Post a Comment (0)
To Top