जब शिक्षक ने अंग्रेजों के खिलाफ उठाई आवाज, नौकरी छोड़ी और जेल गए, आजादी के बाद नेहरू के आदेश पर उसी स्कूल में हुई पुनर्नियुक्ति
बालोद/ अर्जुंदा। स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास केवल बड़े नेताओं और महान आंदोलनों का इतिहास नहीं है, बल्कि यह उन अनगिनत लोगों के त्याग, संघर्ष और संकल्प की कहानी भी है, जिन्होंने अपने व्यक्तिगत सुख और सुविधाओं को छोड़कर देश की आजादी के लिए संघर्ष किया। बालोद जिले की धरती ने भी ऐसे अनेक वीर सपूतों को जन्म दिया, जिन्होंने अंग्रेजी हुकूमत के सामने झुकने से इनकार कर दिया। ऐसे ही स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे ग्राम भरदाकला के स्व. उमेंद्र सिंह कलिहारी, जिनका पूरा जीवन महात्मा गांधी के विचारों और आदर्शों से प्रेरित रहा। वे पेशे से शिक्षक थे, लेकिन जब देश की आजादी का आंदोलन तेज हुआ तो उन्होंने अंग्रेजी शासन के खिलाफ खुलकर आवाज उठाई। स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाने के कारण उन्हें अपनी शिक्षक की नौकरी तक छोड़नी पड़ी और अंग्रेजी हुकूमत ने उन्हें जेल में डाल दिया। लेकिन देश आजाद होने के बाद उनके संघर्ष और त्याग को सम्मान मिला। बताया जाता है कि तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के विशेष आदेश के तहत उनकी उसी अर्जुंदा मिडिल स्कूल में पुनर्नियुक्ति की गई, जहां वे स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल होने से पहले सहायक शिक्षक के रूप में कार्यरत थे। स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की गाथाओं पर आधारित ‘आजादी के दीवाने’ पुस्तक, जिसका लेखन बदरुद्दीन कुरैशी ने किया है, उसमें भी स्व. उमेंद्र सिंह कलिहारी के संघर्ष और योगदान का उल्लेख मिलता है।
‘जब तक देश आजाद नहीं होगा, पलंग पर आराम नहीं करूंगा’
उनके परपोते क्रांति भूषण साहू ( वर्तमान सरपंच और जिला सरपंच संघ बालोद के अध्यक्ष) ने बताया कि महात्मा गांधी के विचारों से गहरे प्रभावित स्व. उमेंद्र सिंह कलिहारी ने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान एक ऐसा संकल्प लिया था, जो उनके दृढ़ निश्चय और देशभक्ति को दर्शाता है। उन्होंने प्रतिज्ञा की थी कि जब तक देश आजाद नहीं हो जाता, तब तक वे पलंग पर आराम नहीं करेंगे।उन्होंने पलंग का बहिष्कार किया और जमीन पर रहकर अपने संकल्प का पालन किया। उनके इस व्रत का प्रभाव परिवार के अन्य सदस्यों पर भी पड़ा और उन्होंने भी इस संकल्प का पालन किया। उनके लिए स्वतंत्रता केवल एक राजनीतिक लक्ष्य नहीं, बल्कि जीवन का सबसे बड़ा संकल्प बन चुकी थी।
1942 में ‘करो या मरो’ के नारे के साथ आंदोलन में कूद पड़े
स्व. उमेंद्र सिंह कलिहारी का जन्म 1 जुलाई 1905 को ग्राम भरदाकला, तत्कालीन दुर्ग जिले में हुआ था। उनके पिता अमोली राम संपन्न कृषक थे। उन्होंने कक्षा छठवीं तक शिक्षा प्राप्त करने के बाद शिक्षकीय जीवन प्रारंभ किया और अर्जुंदा मिडिल स्कूल में सहायक शिक्षक के रूप में कार्य किया। वर्ष 1942 में महात्मा गांधी के ‘करो या मरो’ के आह्वान से प्रेरित होकर वे स्वतंत्रता संग्राम में पूरी तरह सक्रिय हो गए। शिक्षक होने के बावजूद उन्होंने अंग्रेजी शासन के खिलाफ लोगों को जागरूक करने का बीड़ा उठाया। वे गांव-गांव जाकर स्वतंत्रता आंदोलन का प्रचार करते और लोगों में देशभक्ति की भावना जगाते थे। भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान उन्होंने निर्भीकता से भाषण दिए और लोगों में आजादी के लिए जोश और जुनून पैदा किया। उनके नेतृत्व और प्रभाव से क्षेत्र के लोगों में राष्ट्रीय चेतना मजबूत होने लगी। अंग्रेजी शासन के खिलाफ उनकी सक्रियता को देखते हुए पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया।
नौ महीने रायपुर जेल में कैद रहे
स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाने के कारण स्व. उमेंद्र सिंह कलिहारी को अंग्रेजी शासन की कार्रवाई का सामना करना पड़ा। उन्हें 22 अक्टूबर 1942 से 16 जून 1943 तक करीब नौ महीने रायपुर जेल में रखा गया। जेल से लौटने के बाद भी उनके भीतर का संघर्ष और अधिक मजबूत हो गया। उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन के प्रचार-प्रसार को जारी रखा और अपने ओजस्वी भाषणों के माध्यम से लोगों को आजादी के आंदोलन से जोड़ते रहे। उनका जीवन अंग्रेजी शासन के विरुद्ध वैचारिक और सामाजिक संघर्ष का उदाहरण बन गया।
अर्जुंदा में जलाई विदेशी वस्त्रों की होली
महात्मा गांधी के स्वदेशी और खादी के विचारों का स्व. कलिहारी के जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा। उन्होंने जीवनभर खादी पहनने का संकल्प लिया। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान उन्होंने ग्राम अर्जुंदा में विदेशी वस्त्रों की होली जलाकर लोगों को स्वदेशी खादी अपनाने के लिए प्रेरित किया। वे मानते थे कि देश की आजादी केवल अंग्रेजों को भारत से बाहर करने से पूरी नहीं होगी, बल्कि भारतीयों को स्वदेशी, आत्मनिर्भरता और ग्राम स्वराज की दिशा में भी आगे बढ़ना होगा।
कोलकाता कांग्रेस अधिवेशन में भी लिया भाग
स्व. उमेंद्र सिंह कलिहारी को अपने क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हुए अंचल के प्रमुख कार्यकर्ताओं के साथ वर्ष 1930 में कोलकाता कांग्रेस अधिवेशन में भाग लेने का अवसर भी मिला। यह उनके राजनीतिक और सामाजिक सक्रिय जीवन का महत्वपूर्ण अध्याय था। उनका जीवन महात्मा गांधी के विचारों से लगातार प्रभावित रहा और वे गांधीवादी सिद्धांतों को केवल भाषणों तक सीमित रखने के बजाय अपने जीवन में उतारते रहे।
आजादी के बाद उसी स्कूल में हुई पुनर्नियुक्ति
देश को स्वतंत्रता मिलने के बाद उनके संघर्ष और त्याग को सम्मान मिला। तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के आदेश के तहत स्व. उमेंद्र सिंह कलिहारी की पुनर्नियुक्ति अर्जुंदा के उसी मिडिल स्कूल में सहायक शिक्षक के पद पर हुई, जहां से उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय होने के कारण नौकरी छोड़ी थी।स्वतंत्रता संग्राम में उनके योगदान के लिए शासन द्वारा उन्हें ताम्रपत्र देकर सम्मानित भी किया गया। यह सम्मान उनके संघर्ष की आधिकारिक पहचान और देश के प्रति उनके योगदान की स्मृति है।
आजादी के बाद भी जारी रहा ग्राम स्वराज का सपना
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी स्व. कलिहारी का संघर्ष समाप्त नहीं हुआ। वर्ष 1955 में वे संत विनोबा भावे के संपर्क में आए और उनके सर्वोदय कार्यक्रम से जुड़ गए। उन्होंने जनजागरण के लिए अनेक पदयात्राएं कीं और भूदान, ग्रामदान तथा ग्राम स्वराज आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई। उन्होंने ग्रामीण समाज को आत्मनिर्भर बनाने और सामूहिक जिम्मेदारी की भावना विकसित करने के लिए लगातार काम किया। वे दुर्ग जिला सर्वोदय संघ के अध्यक्ष रहे। इसके अलावा दुर्ग शिक्षक संघ के अध्यक्ष के रूप में उन्होंने शिक्षकों की महत्वपूर्ण शैक्षिक समस्याओं के समाधान के लिए भी प्रयास किए। उन्होंने अर्जुंदा परिक्षेत्र के कांग्रेस मंडलेश्वर के रूप में भी दायित्व निभाया। विनोबा भावे की हीरक जयंती के अवसर पर उन्होंने दुर्ग जिले से करीब 50 हजार रुपये की लक्ष्य राशि का संग्रहण कर उन्हें सौंपा। उनका सार्वजनिक जीवन समाजसेवा, स्वदेशी, ग्राम स्वराज और गांधीवादी विचारधारा के प्रति समर्पित रहा।
जीवनभर निभाया स्वदेशी और अहिंसा का व्रत
महात्मा गांधी के आदर्शों का प्रभाव उनके जीवन के अंतिम पड़ाव तक दिखाई देता रहा। उन्होंने अहिंसा के प्रति अपनी प्रतिबद्धता बनाए रखी और समय-समय पर विभिन्न संकल्पों का पालन किया। महात्मा गांधी के जन्मशती वर्ष के दौरान उन्होंने स्वदेशी के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को और मजबूत करते हुए मशीन से तैयार आटा और चावल ग्रहण नहीं करने की शपथ ली। गांधीजी की बुनियादी शिक्षा और ग्राम स्वराज की अवधारणा से प्रभावित होकर उन्होंने शिक्षकीय जीवन से ही चरखे से सूत कातना भी प्रारंभ कर दिया था। महात्मा गांधी से उनकी भेंट उनके जीवन के सबसे सुखद और अविस्मरणीय क्षणों में से एक रही। गांधीजी के विचारों को उन्होंने अपने जीवन में जिस तरह आत्मसात किया, वह उन्हें एक विशिष्ट गांधीवादी स्वतंत्रता सेनानी के रूप में पहचान देता है।
स्वतंत्रता सेनानी के साथ कवि भी थे कलिहारी
स्व. उमेंद्र सिंह कलिहारी केवल स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और शिक्षक ही नहीं, बल्कि एक संवेदनशील कवि और लेखक भी थे। वे डायरी लिखते थे, जिसमें उनके जीवन की अनेक भूली-बिसरी यादों के साथ-साथ उनके साहित्यिक विचार और रचनाएं भी दर्ज थीं। उनकी लेखनी में आजादी, समाज और तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों की झलक मिलती थी। देश की आजादी के अवसर पर उन्होंने ‘भारत वैभव की झांकी’ शीर्षक से कविता लिखी, जिसमें स्वतंत्रता के उस ऐतिहासिक क्षण की भावनाओं को अभिव्यक्त किया गया। उनकी यह रचना बताती है कि वे केवल आजादी के आंदोलन के सक्रिय सेनानी ही नहीं थे, बल्कि अपने समय और समाज को गहराई से देखने और उसे शब्दों में व्यक्त करने वाले संवेदनशील साहित्यकार भी थे।
90 वर्ष की उम्र में हुआ निधन, लेकिन आज भी जीवित है उनकी स्मृति
लंबी बीमारी के बाद 28 अगस्त 1994 को 90 वर्ष की आयु में स्व. उमेंद्र सिंह कलिहारी का निधन हो गया। लेकिन उनके विचार, संघर्ष और त्याग आज भी ग्राम भरदाकला और आसपास के क्षेत्र में लोगों की स्मृतियों में जीवित हैं। भरदाकला के लोग आज भी उन्हें ‘बाबा उमेंद्र कलिहारी’ के रूप में आत्मगौरव और श्रद्धा के साथ याद करते हैं। उनके योगदान के कारण उनका गांव ‘गौरव ग्राम’ के रूप में भी पहचान बना चुका है।
आजादी के दीवाने की कहानी नई पीढ़ी तक पहुंचाना जरूरी
स्व. उमेंद्र सिंह कलिहारी का जीवन हमें यह सिखाता है कि स्वतंत्रता संग्राम केवल एक राजनीतिक आंदोलन नहीं था, बल्कि यह लाखों भारतीयों के जीवन का सबसे बड़ा संकल्प था। एक शिक्षक का अंग्रेजी शासन के खिलाफ खड़ा होना, नौकरी छोड़ना, जेल जाना, खादी और स्वदेशी को अपनाना, पलंग का बहिष्कार करना और आजादी के बाद भी ग्राम स्वराज के लिए संघर्ष करते रहना उनके व्यक्तित्व की दृढ़ता को दर्शाता है।आज जब हम स्वतंत्रता दिवस मनाते हैं, तब भरदाकला के इस महान सपूत को याद करना इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि उनकी कहानी आजादी के उन अनगिनत अध्यायों में से एक है, जो इतिहास की किताबों से कहीं अधिक लोगों की स्मृतियों और गांव की मिट्टी में जीवित हैं। स्व. उमेंद्र सिंह कलिहारी की सादगी, जनसेवा, गांधीवादी विचारधारा और देश के प्रति त्याग एवं समर्पण आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं। ऐसे स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की जीवनगाथा को दस्तावेज के रूप में सुरक्षित करना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
