बालोद के लीड कॉलेज से संविधान के हिंदी रूपांतरण तक: घनश्याम सिंह गुप्त का प्रेरणादायी जीवन, जिन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में जेल यातना भी सही

Darshan Balod
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तस्वीर के लिए साभार : संजीव तिवारी ‘विधान पुरुष : घनश्याम सिंह गुप्त’ नामक  पुस्तक के लेखक


दुर्ग में जन्मे घनश्याम सिंह गुप्त ने स्वतंत्रता संग्राम से लेकर संविधान निर्माण तक निभाई ऐतिहासिक भूमिका, आज बालोद में उनके नाम पर स्थापित महाविद्यालय नई पीढ़ी को दे रहा राष्ट्रसेवा की प्रेरणा

बालोद। भारत के स्वतंत्रता संग्राम और संविधान निर्माण के इतिहास में छत्तीसगढ़ की धरती का योगदान अत्यंत गौरवपूर्ण रहा है। इस गौरवशाली विरासत में घनश्याम सिंह गुप्त का नाम विशेष सम्मान के साथ लिया जाता है। स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भागीदारी, ब्रिटिश शासन के विरुद्ध संघर्ष, अनेक बार जेल यात्रा, विधायी कार्यों में महत्वपूर्ण भूमिका और भारतीय संविधान के हिंदी रूपांतरण में योगदान—घनश्याम सिंह गुप्त का पूरा जीवन राष्ट्रसेवा और जनहित के लिए समर्पित रहा। बालोद जिला मुख्यालय स्थित लीड कॉलेज का नामकरण उनके सम्मान में शासकीय घनश्याम सिंह गुप्त स्नातकोत्तर महाविद्यालय किया जाना उनके योगदान को सम्मान देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है। आज यह महाविद्यालय शिक्षा के साथ-साथ जिले की युवा पीढ़ी को उनके संघर्ष और राष्ट्रनिर्माण की प्रेरणा भी देता है।

दुर्ग में जन्म, शिक्षा के दौरान ही जागा राष्ट्रप्रेम

घनश्याम सिंह गुप्त का जन्म 22 दिसंबर 1885 को दुर्ग में हुआ था। उनके पिता का नाम श्री गैंदसिंह और माता का नाम श्रीमती भानुमति था। उन्होंने रायपुर, जबलपुर और इलाहाबाद में विधि की शिक्षा प्राप्त की। विद्यार्थी जीवन में ही उनमें नेतृत्व क्षमता और राष्ट्रप्रेम की भावना विकसित होने लगी थी। इसी दौरान वे देश के प्रमुख नेता पंडित मदनमोहन मालवीय के संपर्क में आए, जिससे उनकी रुचि देश की राजनीति और स्वतंत्रता आंदोलन की ओर और गहरी हुई। बंगाल विभाजन के विरोध में उन्होंने महाविद्यालय में हड़ताल का नेतृत्व भी किया।

जलियांवाला बाग कांड के विरोध से स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रियता

वर्ष 1919 में वे कांग्रेस के अमृतसर अधिवेशन में प्रतिनिधि के रूप में शामिल हुए। वहां से लौटने के बाद उन्होंने जलियांवाला बाग हत्याकांड के विरोध में सभा आयोजित कर अंग्रेजी शासन के खिलाफ जनभावना को मजबूत किया। वर्ष 1920 में कांग्रेस के नागपुर अधिवेशन में उन्होंने दुर्ग के प्रतिनिधियों का नेतृत्व किया। महात्मा गांधी के आह्वान पर उन्होंने विधान परिषद के चुनाव से अपना नाम वापस लेकर स्वतंत्रता आंदोलन के प्रति अपनी प्रतिबद्धता प्रदर्शित की।

कांग्रेस संगठन में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी

मई 1921 में मध्यप्रांत की प्रांतीय राजनीतिक परिषद ने घनश्याम सिंह गुप्त को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में प्रांत की ओर से भाग लेने के लिए स्थायी सदस्य के रूप में चुना। वे कई वर्षों तक इस जिम्मेदारी का निर्वहन करते रहे। वर्ष 1923 में दुर्ग जिला राजनीतिक परिषद में वे मुख्य वक्ता रहे और इसी वर्ष दुर्ग से विधान परिषद के लिए निर्वाचित हुए। इसके बाद वे लगातार विभिन्न चुनावों में निर्वाचित होते रहे। वर्ष 1925 में वे दुर्ग नगर पालिका परिषद के अध्यक्ष भी चुने गए।

अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ संघर्ष और जेल यात्रा


स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान घनश्याम सिंह गुप्त अंग्रेजी शासन के खिलाफ लगातार मुखर रहे। जून 1930 में उन्होंने पंडित रविशंकर शुक्ल की गिरफ्तारी की आलोचना की। जंगल कानून तोड़ने के आंदोलन में सक्रिय भागीदारी के कारण उन्हें अगस्त 1930 में गिरफ्तार किया गया और छह माह के कारावास तथा 50 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई गई। जुर्माना नहीं भरने पर उन्हें एक माह की अतिरिक्त सजा भी भुगतनी पड़ी। उन्होंने 31 दिसंबर 1932 को गांधी चौक में झंडा फहराकर भी राष्ट्रभक्ति का संदेश दिया। उस समय मध्यप्रांत में कांग्रेस की विभिन्न क्षेत्रीय समितियों को एकीकृत कर संयुक्त संगठन बनाने की जिम्मेदारी भी उन्हें सौंपी गई थी। ब्रिटिश शासन ने इस गतिविधि को रोकने के लिए 28 मई 1932 को कामठी में उन्हें गिरफ्तार किया और उन पर 1500 रुपये का जुर्माना लगाया। जुर्माना नहीं भर पाने के कारण उनकी पुस्तकें तक बेच दी गईं।

जब महात्मा गांधी दुर्ग आए और घनश्याम सिंह गुप्त के घर ठहरे

घनश्याम सिंह गुप्त के जीवन का एक गौरवपूर्ण प्रसंग नवंबर 1933 में महात्मा गांधी की छत्तीसगढ़ यात्रा से जुड़ा है। गांधीजी जब दुर्ग पहुंचे तो वे घनश्याम सिंह गुप्त के घर पर ही ठहरे। इसके बाद दुर्ग जिला हरिजन सेवा संघ का गठन हुआ और घनश्याम सिंह गुप्त को उसका अध्यक्ष बनाया गया। वे दुर्ग के खादी उद्योग केंद्र से भी जुड़े रहे, जिसकी स्थापना वर्ष 1936 में हुई थी। आर्य समाज से जुड़े रहते हुए उन्होंने सामाजिक सुधार और शिक्षा के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण कार्य किए।

बालोद से विधानसभा तक पहुंची ऐतिहासिक राजनीतिक यात्रा

वर्ष 1934 में वे केंद्रीय धारा सभा के लिए कांग्रेस की ओर से चुने गए। इसके बाद वर्ष 1937 में बालोद क्षेत्र से प्रांतीय धारा सभा के लिए निर्वाचित हुए और मध्यप्रांत एवं बरार विधानसभा के अध्यक्ष बने। ब्रिटिश शासनकाल में गठित सरकारों के दौर में भी उन्होंने विधानसभा अध्यक्ष के रूप में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभाई। बाद में वर्ष 1946 में भी वे प्रांतीय विधानसभा के लिए निर्वाचित हुए और मध्यप्रांत एवं बरार विधानसभा के अध्यक्ष बनाए गए। बालोद क्षेत्र से उनका यह जुड़ाव आज भी ऐतिहासिक महत्व रखता है। यही कारण है कि बालोद में उनके नाम पर स्थापित महाविद्यालय उनके सार्वजनिक जीवन और राष्ट्रनिर्माण में योगदान की स्मृति को जीवित रखता है।

युद्ध विरोधी भाषण के कारण फिर हुई गिरफ्तारी

वर्ष 1939 में विधान परिषद भंग होने के बाद ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध युद्ध विरोधी भाषण देने के कारण घनश्याम सिंह गुप्त को गिरफ्तार कर लिया गया और उन्हें एक वर्ष के कठोर कारावास की सजा दी गई। वे 29 नवंबर 1940 से 10 सितंबर 1941 तक नागपुर जेल में रहे। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान उनकी जेल यात्राएं इस बात का प्रमाण हैं कि उन्होंने अपने सिद्धांतों और राष्ट्रहित से कभी समझौता नहीं किया।

संविधान के हिंदी रूपांतरण में निभाई ऐतिहासिक भूमिका

स्वतंत्र भारत के संविधान निर्माण के दौर में भी घनश्याम सिंह गुप्त ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वे संविधान के हिंदी रूपांतरण से जुड़ी समिति के सदस्य और हिंदी अनुवाद कार्य से जुड़े प्रमुख व्यक्तित्वों में शामिल रहे। उन्होंने संविधान की जटिल विधिक भाषा को हिंदी में सहज रूप देने के प्रयास में महत्वपूर्ण योगदान दिया। संविधान को हिंदी भाषी जनमानस तक पहुंचाने के इस कार्य में उनका योगदान छत्तीसगढ़ के लिए विशेष गौरव का विषय है।

राष्ट्रसेवा, समाज सुधार और शिक्षा के लिए समर्पित रहा जीवन

घनश्याम सिंह गुप्त ने स्वतंत्रता आंदोलन और राजनीति के साथ-साथ आर्य समाज के माध्यम से समाज सुधार और शिक्षा के विकास के लिए भी काम किया। वे सामाजिक कुरीतियों के विरोधी और शिक्षा के समर्थक थे। उनका जीवन इस बात का उदाहरण है कि एक व्यक्ति स्वतंत्रता सेनानी, विधिवेत्ता, जनप्रतिनिधि, विधानसभा अध्यक्ष और समाज सुधारक के रूप में अलग-अलग क्षेत्रों में योगदान देते हुए राष्ट्रनिर्माण में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

बालोद के युवाओं के लिए आज भी प्रेरणा हैं घनश्याम सिंह गुप्त

घनश्याम सिंह गुप्त का निधन 13 जून 1976 को हुआ, लेकिन उनका योगदान आज भी जीवित है। स्वतंत्रता आंदोलन में संघर्ष से लेकर संविधान के हिंदी रूपांतरण तक उनकी यात्रा नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा का स्रोत है। बालोद में उनके नाम पर स्थापित शासकीय घनश्याम सिंह गुप्त स्नातकोत्तर महाविद्यालय केवल एक शिक्षण संस्थान नहीं, बल्कि उस महान व्यक्तित्व की स्मृति और राष्ट्रसेवा की विरासत का प्रतीक भी है। आज जब बालोद के विद्यार्थी इसी महाविद्यालय में शिक्षा प्राप्त कर अपने भविष्य का निर्माण कर रहे हैं, तब उनके लिए यह जानना भी प्रेरणादायी है कि इसी क्षेत्र से जुड़े एक महान व्यक्तित्व ने देश की आजादी के लिए जेल यातनाएं सहीं, लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत किया और संविधान को आम जनता की भाषा में समझने योग्य बनाने में योगदान दिया। घनश्याम सिंह गुप्त का जीवन हमें यही संदेश देता है कि शिक्षा और ज्ञान का सर्वोच्च उद्देश्य केवल व्यक्तिगत सफलता नहीं, बल्कि राष्ट्र और समाज के निर्माण में योगदान देना है।

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