कंगला मांझी: बालोद की धरती से उठी वह आवाज, जिसने जल-जंगल-जमीन के अधिकार और आदिवासी स्वाभिमान की लड़ाई को देशभर में पहुंचाया

Darshan Balod
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बघमार में आज भी जिंदा है कंगला मांझी की विरासत, तीन दिनों तक सैन्य अनुशासन में जुटते हैं देशभर के मांझी सरकार के सैनिक

बालोद/ डौंडीलोहारा। छत्तीसगढ़ के बालोद जिले के डौंडीलोहारा विकासखंड का बघमार गांव सामान्य गांवों से बिल्कुल अलग पहचान रखता है। घने जंगलों के बीच बसा यह गांव हर वर्ष दिसंबर में तीन दिनों के लिए देशभर से आने वाले आदिवासी समाज के लोगों और मांझी सरकार के सैनिकों की मौजूदगी से जीवंत हो उठता है। खाकी वर्दी पहने सैकड़ों पुरुष-महिलाएं अनुशासनबद्ध तरीके से यहां पहुंचते हैं। तंबू लगते हैं, अस्थायी बाजार सजते हैं और गांव का वातावरण किसी सैन्य शिविर जैसा दिखाई देने लगता है। यह आयोजन उस महान व्यक्तित्व की स्मृति से जुड़ा है, जिन्हें आदिवासी समाज कंगला मांझी के नाम से याद करता है।

कौन थे कंगला मांझी, क्यों बना बघमार उनकी कर्मभूमि



कंगला मांझी का वास्तविक नाम हीरा सिंह देव मांझी बताया जाता है। उनका जन्म बस्तर क्षेत्र के तेलावट गांव में हुआ था। आदिवासी समाज के अधिकारों, जल-जंगल-जमीन के संरक्षण और अंग्रेजी शासन के अन्याय के खिलाफ उन्होंने कम उम्र से ही संघर्ष का रास्ता अपनाया। वर्ष 1913 से वे स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े और बाद में बालोद जिले के डौंडीलोहारा क्षेत्र के बघमार गांव को अपनी गतिविधियों का प्रमुख केंद्र बनाया। उन्होंने आदिवासी समाज को संगठित करने और उनके भीतर अधिकारों तथा स्वाभिमान की भावना जगाने का काम किया। उनके आंदोलन से प्रभावित होकर देश के विभिन्न हिस्सों में उनके अनुयायी और मांझी सरकार के सैनिक तैयार हुए।

अंग्रेजों के खिलाफ आवाज से लेकर आदिवासी अधिकारों की लड़ाई तक

कंगला मांझी का संघर्ष केवल अंग्रेजी शासन के विरोध तक सीमित नहीं था। वे आदिवासियों को उनके जल, जंगल और जमीन पर अधिकार तथा सामाजिक सम्मान दिलाने के लिए भी लगातार आवाज उठाते रहे। उनका मानना था कि आदिवासी समाज की संस्कृति, परंपरा और प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा के बिना वास्तविक विकास संभव नहीं है। इसी विचारधारा को आगे बढ़ाते हुए आज भी मांझी सरकार से जुड़े लोग समाज को संगठित करने और आदिवासी हितों के मुद्दों पर सक्रिय रहने का दावा करते हैं।

महात्मा गांधी से मुलाकात और राष्ट्रीय नेताओं से संपर्क का दावा

कंगला मांझी के आंदोलन से जुड़े लोगों के अनुसार, स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान उनका संपर्क राष्ट्रीय नेताओं से भी रहा। बताया जाता है कि 1920 में कोलकाता में उनकी महात्मा गांधी से मुलाकात हुई, जिसके बाद उनके आंदोलन को राष्ट्रीय स्वतंत्रता संघर्ष की विचारधारा से और अधिक प्रेरणा मिली। उनके अनुयायी यह भी बताते हैं कि कंगला मांझी ने गांधीजी के सत्य, अहिंसा और स्वावलंबन के विचारों से प्रेरणा लेते हुए आदिवासी समाज को संगठित किया।

इंदिरा गांधी से मुलाकात की तस्वीर भी बनी ऐतिहासिक स्मृति


कंगला मांझी की विरासत से जुड़े परिवार और संगठन के पास उपलब्ध पुरानी तस्वीरों में 31 सितंबर 1984 की एक तस्वीर को अंतरराष्ट्रीय प्रधानमंत्री भेंट के रूप में दर्शाया गया है, जिसमें तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी के साथ कंगला मांझी से जुड़े प्रतिनिधिमंडल की मुलाकात दिखाई देती है। यह तस्वीर आज उनके आंदोलन और राष्ट्रीय स्तर पर बनी पहचान से जुड़े महत्वपूर्ण स्मृति दस्तावेज के रूप में सामने आती है। हालांकि, इस तस्वीर से संबंधित कार्यक्रम का आधिकारिक विवरण और मुलाकात का सटीक संदर्भ स्वतंत्र रूप से प्रमाणित किए जाने की आवश्यकता है, इसलिए इसे ऐतिहासिक दस्तावेज के रूप में संरक्षित करना और इसके संदर्भ की पुष्टि करना महत्वपूर्ण होगा।

नेताजी सुभाष चंद्र बोस और मांझी सरकार की वर्दीधारी परंपरा

मांझी सरकार के अनुयायियों के अनुसार, कंगला मांझी ने आदिवासी समाज को संगठित करने के लिए एक अनुशासित वर्दीधारी संगठनात्मक व्यवस्था विकसित की थी। उनके संगठन के सैनिक आज भी खाकी वर्दी पहनकर कार्यक्रमों में शामिल होते हैं। उनके पास हथियारों के बजाय अनुशासन और सामाजिक एकजुटता को प्रमुखता दी जाती है। डंडा उनके पारंपरिक अनुशासन का प्रतीक माना जाता है। उनके अनुयायी इस व्यवस्था को नेताजी सुभाष चंद्र बोस की आजाद हिंद फौज से प्रेरित संगठनात्मक भावना से जोड़कर देखते हैं।

नेहरू से जुड़ी स्मृतियां और राष्ट्रीय आंदोलन की विरासत

कंगला मांझी से जुड़े लोगों के अनुसार, उनके आंदोलन को देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू का भी समर्थन और प्रोत्साहन प्राप्त हुआ था। बताया जाता है कि वर्ष 1951 में नेहरू द्वारा उन्हें एक बिल्ला प्रदान किया गया था। वर्ष 1956 में उन्हें दुर्ग जिले की कचहरी में तिरंगा फहराने का गौरव प्राप्त होने का भी उल्लेख मिलता है। ये प्रसंग कंगला मांझी की स्मृति से जुड़े महत्वपूर्ण दावे हैं, जिन्हें उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर और अधिक प्रमाणित एवं संरक्षित किए जाने की आवश्यकता है।

बघमार में हर वर्ष लगता है कंगला मांझी स्मृति का अनूठा जमावड़ा

कंगला मांझी की स्मृति में प्रत्येक वर्ष दिसंबर में बघमार में तीन दिवसीय आयोजन होता है। देश के विभिन्न राज्यों से मांझी सरकार के सैनिक और अनुयायी यहां पहुंचते हैं। सर्द रातों में कई लोग तंबुओं और पेड़ों के नीचे रुककर आयोजन में शामिल होते हैं। तीन दिनों तक जल, जंगल, जमीन, शिक्षा, सामाजिक विकास और आदिवासी समाज से जुड़े विभिन्न विषयों पर चिंतन-मनन किया जाता है। कंगला मांझी की समाधि पर श्रद्धांजलि अर्पित कर उनके संघर्षों को आगे बढ़ाने का संकल्प लिया जाता है।

अनुशासन बना मांझी सैनिकों की पहचान


बघमार पहुंचने वाले मांझी सरकार के सैनिकों की सबसे अलग पहचान उनका अनुशासन है। दूर-दराज के राज्यों से आने वाले लोग निर्धारित वेशभूषा में रहते हैं और पूरे आयोजन के दौरान एक अनुशासित व्यवस्था का पालन करते हैं। गांव में कुछ अस्थायी दुकानें भी सजती हैं, जहां वर्दी, जूते, बेल्ट, बैग और संगठन से जुड़े प्रतीक चिन्ह उपलब्ध होते हैं। तीन दिनों तक बघमार का माहौल आदिवासी परंपरा, सामाजिक चिंतन और संगठनात्मक अनुशासन का अनूठा संगम बन जाता है।

कंगला मांझी की शहादत और बघमार से जुड़ी अमर स्मृति


कंगला मांझी का निधन 5 दिसंबर 1984 को हुआ था। उनकी स्मृति में प्रत्येक वर्ष 5 दिसंबर को समाधि स्थल पर श्रद्धांजलि कार्यक्रम आयोजित किया जाता है। इस अवसर पर देश के विभिन्न हिस्सों से मांझी सरकार के सैनिक पहुंचते हैं और पारंपरिक तरीके से उन्हें सलामी देकर श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। उनकी स्मृति में आयोजित यह कार्यक्रम अब बघमार की विशिष्ट पहचान बन चुका है।

आज भी जीवित है कंगला मांझी का विचार

कंगला मांझी का जीवन आदिवासी समाज के अधिकार, स्वाभिमान और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण की लड़ाई से जुड़ा हुआ है। उनके अनुयायियों के लिए बघमार केवल एक गांव नहीं, बल्कि संघर्ष, संगठन और सामाजिक चेतना की धरती है। स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में कंगला मांझी जैसे व्यक्तित्वों की भूमिका पर गंभीर शोध और दस्तावेजीकरण की जरूरत है, ताकि आने वाली पीढ़ियां यह जान सकें कि देश की आजादी और सामाजिक अधिकारों की लड़ाई केवल बड़े शहरों तक सीमित नहीं थी, बल्कि जंगलों और गांवों के बीच भी अनेक लोगों ने अपने तरीके से संघर्ष की मशाल जलाए रखी थी। कंगला मांझी की कहानी आज भी यही संदेश देती है कि किसी भी समाज की असली ताकत उसकी एकता, स्वाभिमान और अपनी मिट्टी, संस्कृति एवं प्राकृतिक विरासत के प्रति जिम्मेदारी में निहित होती है। बघमार में हर वर्ष जुटने वाले मांझी सरकार के सैनिक इसी विरासत को जीवित रखने का प्रयास करते नजर आते हैं।

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