डौंडीलोहारा के भरदा गांव से निकले उस जुझारू सेनानी की कहानी, जिन्हें राष्ट्रपति डॉ. राधाकृष्णन ने 1961 में उत्कृष्ट शिक्षक के रूप में किया सम्मानित; तीन बार विधायक बनकर भी निभाई जनसेवा की जिम्मेदारी
बालोद/डौंडीलोहारा। देश की आजादी की लड़ाई केवल बड़े शहरों और चर्चित नेताओं तक सीमित नहीं थी। छत्तीसगढ़ के गांव-गांव में भी ऐसे अनेक वीर सपूत हुए, जिन्होंने अपने जीवन का एक बड़ा हिस्सा अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ संघर्ष और जनजागरण में लगा दिया। डौंडीलोहारा विकासखंड के छोटे से ग्राम भरदा निवासी हीरालाल सोनबोइर भी ऐसे ही कर्मठ स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे, जिन्होंने शिक्षक रहते हुए गांव-गांव में आजादी की अलख जगाई। अंग्रेजों के खिलाफ पर्चे बांटने से लेकर जेल जाने तक का संघर्ष करने वाले हीरालाल सोनबोइर ने आजादी के बाद शिक्षा के क्षेत्र में भी अपनी अमिट पहचान बनाई। वर्ष 1961 में तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन द्वारा उन्हें उत्कृष्ट शिक्षक के रूप में सम्मानित किया गया। बाद में वे राजनीति में आए और तीन बार विधायक चुने गए।
किसान परिवार में जन्मे, नाम पड़ा हीरालाल
हीरालाल सोनबोइर का जन्म 1 जनवरी 1907 को ग्राम भरदा के एक सामान्य किसान परिवार में हुआ था। उनके पिता घनाराम साहू और माता ग्वालिन बाई थीं। उनके जन्म के समय एक केंवट ने उनकी मां से कहा था—“तोर बेटा हीरा कस चमकत हे।” बच्चे के उज्ज्वल भविष्य की इस बात ने परिवार को प्रभावित किया और उनका नाम हीरालाल रखा गया। आगे चलकर यही बालक अपने संघर्ष, शिक्षा और जनसेवा से क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाने में सफल हुआ।
‘कपड़ा पहनो खादी, जय बोलो महात्मा गांधी’ ने मन में जलाई आजादी की चिंगारी
हीरालाल सोनबोइर जब महज सात-आठ वर्ष के थे, तब उन्होंने एक नारा सुना—“कपड़ा पहनो खादी के, जय बोलो महात्मा गांधी के।” यह नारा उनके बालमन पर ऐसा प्रभाव छोड़ गया कि उनके भीतर महात्मा गांधी और स्वतंत्रता आंदोलन के प्रति श्रद्धा पैदा हो गई। यही श्रद्धा धीरे-धीरे देश को अंग्रेजी शासन से मुक्त कराने के संकल्प में बदल गई। उन्होंने अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद वर्ष 1924 में प्राथमिक शाला सोरर में शिक्षक के रूप में सेवाएं शुरू कीं। इसके बाद वर्ष 1928 में अर्जुंदा मिडिल स्कूल में शिक्षक बने। शिक्षक का दायित्व निभाते हुए भी उनके मन में देश को आजाद कराने का जुनून कम नहीं हुआ।
स्कूल की छुट्टी के बाद तिरंगा लेकर निकल पड़ते थे गांव-गांव
हीरालाल सोनबोइर केवल कक्षा में बच्चों को पढ़ाने वाले शिक्षक नहीं थे, बल्कि वे समाज में राष्ट्रीय चेतना जगाने वाले जनशिक्षक भी बन गए थे। सप्ताह में कई दिन स्कूल की छुट्टी के बाद वे बच्चों और अन्य शिक्षकों को साथ लेकर कांदुल, परसतरई, मनकी, मटिया सहित आसपास के गांवों में जनजागरण के लिए निकल पड़ते थे। हाथों में तिरंगा होता और गांवों में चौपाल लगाकर लोगों को देश की आजादी के आंदोलन से जोड़ने का प्रयास किया जाता। चौपालों में ग्रामीणों की भीड़ जुटती और स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े नेतृत्वकर्ता लोगों को अंग्रेजी शासन के खिलाफ एकजुट होने का संदेश देते। इस दौरान उमेंद सिंह कलिहारी और छोटेलाल सहित अन्य साथियों के साथ भी उन्होंने जुलूस और जनजागरण कार्यक्रमों में भाग लिया।
अंग्रेजों की आंखों में खटकने लगे, पर्चे बांटकर बढ़ाते रहे आंदोलन
स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान हीरालाल सोनबोइर का संघर्ष और अधिक तेज हो गया। पैरी (सिकोसा) में पदस्थ रहने के दौरान भी वे अंग्रेजी शासन के खिलाफ जनजागरण से जुड़े रहे। शिक्षक होने के साथ वे डाकखाने का काम भी देखते थे। इसी दौरान वे अंग्रेजी शासन के खिलाफ लिखे गए पर्चों को लोगों तक पहुंचाने में सक्रिय रहे। बताया जाता है कि अंग्रेजों को जब इन पर्चों के वितरण की जानकारी मिली तो उन्होंने मामले की जांच के लिए सीआईडी हवलदार को पैरी भेजा। हीरालाल पूरे दिन सीआईडी के अधिकारी के साथ रहे, लेकिन पर्चे को सुरक्षित तरीके से एक किसान रामप्रसाद को सौंप दिया गया, जिसे पैरावट में छिपा दिया गया। अंग्रेजी अफसरों की तमाम कोशिशों के बावजूद उन्हें वह पर्चा नहीं मिल सका।इसके बाद अंग्रेजी शासन ने सीआईडी, थानेदार और पटवारी को मामले की जांच के लिए भेजा। हीरालाल ने उन्हें बताया कि पर्चे लोगों में बांटे जा चुके हैं और अब लोगों से ही उन्हें प्राप्त किया जा सकता है। अंग्रेजी शासन को यह गतिविधियां नागवार गुजरीं और आखिरकार उन्हें नौकरी से बर्खास्त कर जेल भेज दिया गया। देश की आजादी के लिए उनका यह संघर्ष उनके साहस और राष्ट्रभक्ति का प्रमाण बन गया।
आजादी की पहली सुबह डौंडीलोहारा में मनाया ऐतिहासिक जश्न
जब 15 अगस्त 1947 को देश आजाद हुआ, उस समय हीरालाल सोनबोइर डौंडीलोहारा में पदस्थ थे। आजादी की खबर ने पूरे क्षेत्र में उत्साह भर दिया। तत्कालीन दीवान मन्नाराम पांडेय, चंद्रिका प्रसाद पांडेय और पंडित राधेश्याम शर्मा की मौजूदगी में ग्रामीणों की बैठक हुई और स्वतंत्रता दिवस को ऐतिहासिक रूप से मनाने का निर्णय लिया गया। आजादी की खुशी में तत्काल विजय चबूतरे का निर्माण कराया गया। सुबह बच्चों का जुलूस निकाला गया और पूरा क्षेत्र देशभक्ति के रंग में रंग गया। जमींदारों द्वारा बच्चों को पेंट-शर्ट दिए गए, वहीं जरूरतमंद और गरीब लोगों को भोजन कराया गया तथा वस्त्र वितरित किए गए। यह दिन हीरालाल सोनबोइर और क्षेत्र के लोगों के लिए जीवनभर याद रहने वाला ऐतिहासिक अवसर बन गया।
राष्ट्रपति डॉ. राधाकृष्णन ने किया उत्कृष्ट शिक्षक के रूप में सम्मान
स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भूमिका निभाने के बाद हीरालाल सोनबोइर ने शिक्षा के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय योगदान दिया। उनके समर्पण और उत्कृष्ट सेवाओं को देखते हुए वर्ष 1961 में तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने उन्हें उत्कृष्ट शिक्षक के रूप में सम्मानित किया। यह सम्मान पाने वाले वे क्षेत्र के पहले स्वतंत्रता संग्राम सेनानी शिक्षक के रूप में भी याद किए जाते हैं। सम्मान प्राप्त कर लौटने पर लाटाबोड़ में उनका भव्य स्वागत किया गया।
60 वर्ष की उम्र में राजनीति में प्रवेश, तीन बार बने विधायक
हीरालाल सोनबोइर का सार्वजनिक जीवन केवल स्वतंत्रता संग्राम और शिक्षा तक सीमित नहीं रहा। करीब 60 वर्ष की उम्र में कांग्रेस ने उन्हें बालोद विधानसभा क्षेत्र से अपना प्रत्याशी बनाया। जनता के बीच उनकी लोकप्रियता और जनसेवा की भावना के कारण वे चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचे। वे 1967, 1972 और 1980 में विधायक रहे और जनहित के मुद्दों को सदन तक पहुंचाते हुए क्षेत्र की सेवा की।
90 वर्ष की उम्र में विदा हुआ आजादी का वह सिपाही
एक साधारण किसान परिवार में जन्म लेकर स्वतंत्रता सेनानी, शिक्षक, राष्ट्रपति सम्मानित शिक्षक और तीन बार विधायक बनने तक का सफर तय करने वाले हीरालाल सोनबोइर ने अपना पूरा जीवन देश, समाज, शिक्षा और जनसेवा को समर्पित किया। 16 अप्रैल 1997 को 90 वर्ष की आयु में उन्होंने अंतिम सांस ली। हीरालाल सोनबोइर का जीवन आज भी नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा है। उन्होंने यह साबित किया कि देशभक्ति केवल रणभूमि में लड़ने का नाम नहीं, बल्कि अपने समय, ज्ञान और सामर्थ्य को राष्ट्र के लिए समर्पित करने का भी नाम है। शिक्षक बनकर उन्होंने बच्चों को शिक्षा दी, तिरंगा लेकर गांव-गांव राष्ट्रीय चेतना जगाई, अंग्रेजी शासन का विरोध किया, जेल की यातनाएं सहीं और आजादी के बाद भी शिक्षा तथा राजनीति के माध्यम से समाज की सेवा करते रहे। डौंडीलोहारा के भरदा गांव के इस सपूत की कहानी छत्तीसगढ़ के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास का वह गौरवशाली अध्याय है, जिसे नई पीढ़ी तक पहुंचाना और संजोकर रखना हम सभी की जिम्मेदारी है। शासन ने इस ओर ध्यान भी दिया है, अब उनके जीवन की कहानी छग में कक्षा 4 के सहायक वाचन विषय में शामिल कर लिया गया है जो जिले के लिए भी गर्व की बात है।
