मेहनत और अनुभव के दम पर बनाई पहचान, बेटे ने भी संभाली पिता की ठेकेदारी की विरासत
अंडा। दुर्ग ग्रामीण विधानसभा क्षेत्र के ग्राम अंडा के गांधी नगर निवासी दुखित राम देशमुख, पिता बंशीलाल देशमुख, पिछले करीब 32 वर्षों से निर्माण एवं ठेकेदारी के कार्य से जुड़े हुए हैं। सीमित शिक्षा के बावजूद उन्होंने अपनी मेहनत, लगन और वर्षों के अनुभव के बल पर निर्माण कार्य के क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाई। इसी व्यवसाय के माध्यम से वे लंबे समय से अपने परिवार का पालन-पोषण करते आ रहे हैं।
दुखित राम देशमुख बताते हैं कि उन्होंने करीब 20 वर्षों तक मरोदा में रहकर भिलाई इस्पात संयंत्र में काम किया। इसके बाद भवन निर्माण, घर निर्माण एवं ठेकेदारी के क्षेत्र में कदम रखा। तीन दशक से अधिक समय से निर्माण कार्य से जुड़े रहने के दौरान उन्होंने अपने अनुभव से काम को विस्तार दिया। वर्तमान में उनके साथ 60 से अधिक लेवलर काम करते हैं, जिन्हें उनके माध्यम से रोजगार मिल रहा है।
बेटे ने भी अपनाया पिता का व्यवसाय
दुखित राम देशमुख के परिवार में एक पुत्र अमर देशमुख (45 वर्ष) और चार बेटियां हैं। चारों बेटियों का विवाह हो चुका है और वे अपने-अपने ससुराल में रह रही हैं। पिता को वर्षों से ठेकेदारी का काम करते देखते हुए उनके पुत्र अमर देशमुख ने भी इसी व्यवसाय को अपना लिया। अब वे पिता के साथ मिलकर ठेकेदारी का काम संभाल रहे हैं।
32 वर्षों से विश्वकर्मा पूजा की परंपरा
निर्माण कार्य से जुड़े दुखित राम देशमुख की भगवान विश्वकर्मा के प्रति गहरी आस्था है। वे पिछले करीब 32 वर्षों से विश्वकर्मा जयंती के अवसर पर भगवान विश्वकर्मा की प्रतिमा स्थापित कर पूजा-अर्चना करते आ रहे हैं। हर वर्ष 17 सितंबर को अपने घर में भगवान विश्वकर्मा की प्रतिमा स्थापित कर विधि-विधान से पूजा-पाठ करते हैं।
पूजा के बाद वे अपने साथ काम करने वाले लेवलरों के साथ दो दिवसीय भ्रमण पर भी जाते हैं। इसके बाद भगवान विश्वकर्मा की प्रतिमा का नदी में विसर्जन किया जाता है और सभी वापस घर लौटते हैं। तीन दशक से अधिक समय से चली आ रही यह परंपरा अब उनके परिवार और साथ काम करने वाले लोगों के बीच आस्था, अपनापन और आपसी भाईचारे का हिस्सा बन गई है।
मेहनत को बनाया जीवन का आधार
वर्सन — दुखित राम देशमुख:
“मैंने अपने जीवन में मेहनत और काम को हमेशा प्राथमिकता दी है। वर्षों तक निर्माण कार्य से जुड़े रहने के बाद आज मेरे साथ बड़ी संख्या में लोग काम कर रहे हैं। मेरे बेटे का भी इसी व्यवसाय में जुड़ना मेरे लिए खुशी की बात है। वह मेरे अनुभव और काम को आगे बढ़ा रहा है। भगवान विश्वकर्मा के प्रति हमारी आस्था और पूजा की परंपरा भी इसी तरह आगे चलती रहे, यही कामना है।”

