तीन जलधाराओं के संगम पर विराजमान मां दुर्गा का मंदिर, रामायण समिति ने रखी थी निर्माण की नींव
बालोद। आस्था, श्रद्धा और धार्मिक परंपराओं से जुड़ा दुर्गा मंदिर त्रिवेणी संगम, किरगी-सोनेसरार क्षेत्र के प्रमुख धार्मिक स्थलों में से एक है। लगभग 45 वर्ष पुराने इस मंदिर में हर वर्ष नवरात्रि के अवसर पर भक्तों द्वारा मनोकामना ज्योतियां प्रज्वलित की जाती हैं। श्रद्धालु मां दुर्गा के दर्शन कर सुख-समृद्धि और परिवार की खुशहाली की कामना करते हैं।
इस मंदिर का नाम त्रिवेणी संगम इसलिए पड़ा, क्योंकि यहां शिवनाथ नदी, मटिया मोतीनाला और किर्गी नाला का संगम होता है। नदियों और जलधाराओं के इस संगम के कारण यह स्थान धार्मिक आस्था के साथ-साथ क्षेत्र की विशिष्ट पहचान भी रखता है।
रामायण समिति ने की थी मंदिर निर्माण की शुरुआत
मंदिर निर्माण की शुरुआत लगभग 45 वर्ष पूर्व रामायण समिति के सदस्यों और स्थानीय श्रद्धालुओं के सहयोग से हुई थी। इसमें स्वर्गीय रूपलाल साहू, फूलसिंग माहला, खेमचंद सोनसारवा (किरगी), जगदीश साहू, भागीराम ठाकुर (रूपाकाठी), बलिराम साहू, रामा सिन्हा, पुरन साहू, विषम दाऊ, भगवानदास दाऊ, रामाधार साहू (सुखरी) और विसेसर ठाकुर सहित अन्य लोगों का योगदान रहा।
स्थानीय लोगों के सामूहिक प्रयासों से स्थापित यह मंदिर समय के साथ श्रद्धालुओं की आस्था का महत्वपूर्ण केंद्र बन गया है। नवरात्रि के दौरान यहां धार्मिक माहौल रहता है और भक्तजन मनोकामना ज्योति प्रज्वलित कर मां दुर्गा की आराधना करते हैं।
पुजारियों की देखरेख में होती है पूजा-अर्चना
मंदिर में भागीराम ठाकुर एवं लोकेश्वर साहू पुजारी के रूप में धार्मिक गतिविधियों और पूजा-अर्चना से जुड़े हुए हैं। नवरात्रि के दौरान मंदिर में श्रद्धालुओं की आस्था और भक्ति विशेष रूप से देखने को मिलती है।
त्रिवेणी संगम मंदिर किरगी-सोनेसरार केवल पूजा-अर्चना का स्थल ही नहीं, बल्कि स्थानीय लोगों की धार्मिक परंपराओं, सामूहिक सहयोग और वर्षों पुरानी आस्था का प्रतीक भी है। लगभग साढ़े चार दशक से यह मंदिर क्षेत्र की धार्मिक विरासत को संजोए हुए है।










