माईलोगिन हो या कुँवारी,
हिरदे म सब्बो बर सम्मान।
हर महतारी मोर महतारी।
मया अउ ममता के मूरत नारी,
सुख-दुख म बनथे संगवारी।
नारी के मान रखव सब्बो झन,
ओखरे ले महकय दुनिया सारी।।
पूजा ले बढ़के हे जिम्मेदारी,
कोनो बेबस झन बने बेचारी।
राखव दुलार के मया म अपन,
अपन घर के बना राजदुलारी।।
दुरगा दाई तोर बघवा सवारी,
पूजा तोर कठिन हे बड़ भारी।
मूरत म तोला नव दिन पुजथे,
नोचथे काबर फेर जीवित नारी।।
— विक्रमसिंह "लाला"
मुरता, बेमेतरा, छत्तीसगढ़

